30 Nov 2025 आध्यात्मिक मार्गदर्शन विश्वसनीय जानकारी

अहोई अष्टमी

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अहोई अष्टमी एक महत्वपूर्ण हिंदू पर्व है, जिसे खासतौर पर माताओं द्वारा अपने बच्चों की लंबी आयु, सुख-समृद्धि, और कल्याण के लिए मनाया जाता है। यह व्रत अहोई अष्टमी के दिन कार्तिक महीने के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को रखा जाता है। इस दिन माताएं निर्जल व्रत रखती हैं और अहोई माता की पूजा करती हैं। अहोई अष्टमी का व्रत खासकर उन महिलाओं के लिए महत्वपूर्ण है जो संतान की प्राप्ति की कामना करती हैं या अपनी संतान की भलाई के लिए प्रार्थना करती हैं। पूजा के दौरान अहोई माता की तस्वीर या प्रतीक बनाकर उसकी पूजा की जाती है और फिर रात के समय तारों को देखकर व्रत का समापन किया जाता है। अहोई अष्टमी का व्रत करवा चौथ के ठीक चार दिन बाद आता है, और यह पर्व मुख्य रूप से उत्तर भारत में अधिक प्रसिद्ध है। अहोई अष्टमी की कहानी और व्रत की प्रक्रिया का हिंदू धर्म में विशेष महत्व है। इसे माताएं अपनी संतान की लंबी आयु, समृद्धि और सुरक्षा के लिए करती हैं। यहां अहोई अष्टमी की कहानी और व्रत करने की पूरी प्रक्रिया दी जा रही है:

अहोई अष्टमी की कथा (कहानी):

बहुत समय पहले एक गांव में एक साहूकार की पत्नी थी, जिसके सात बेटे थे। एक दिन दीपावली से पहले वह जंगल में मिट्टी खोदने गई ताकि अपने घर को सजाने के लिए मिट्टी ला सके। मिट्टी खोदते समय गलती से उसकी कुदाल से एक साही (साही या स्याही एक छोटा जानवर है) के बच्चे की मृत्यु हो गई। इस घटना से वह बहुत दुखी हुई, लेकिन समय के साथ यह बात भूल गई। कुछ समय बाद उसके सातों बेटे एक-एक करके मृत्यु को प्राप्त हो गए। इस घटना से वह स्त्री अत्यंत दुखी हो गई और किसी ऋषि से इसका कारण पूछा। ऋषि ने बताया कि साही के बच्चे की मृत्यु के कारण उसे यह दुख सहना पड़ रहा है। ऋषि ने उसे सलाह दी कि वह अहोई माता का व्रत रखे और उनके चित्र के आगे प्रार्थना करे। इससे उसका पाप समाप्त हो जाएगा और उसकी संतान को दीर्घायु का आशीर्वाद मिलेगा। साहूकार की पत्नी ने यह व्रत किया और विधिपूर्वक अहोई माता की पूजा की। उसकी पूजा से प्रसन्न होकर माता ने उसकी संतान को पुनः जीवनदान दिया। तब से माताएं अहोई अष्टमी का व्रत करती हैं ताकि उनके बच्चे लंबी उम्र और समृद्ध जीवन प्राप्त करें।

अहोई अष्टमी व्रत की प्रक्रिया (विधि):

व्रत का संकल्प: प्रातःकाल स्नान आदि से निवृत्त होकर महिलाएं व्रत का संकल्प लेती हैं। यह व्रत निर्जला (बिना पानी के) रखा जाता है, लेकिन कुछ महिलाएं फलाहार करती हैं। अहोई माता की तस्वीर या प्रतिमा:दीवार पर अहोई माता की तस्वीर या प्रतीक (जिसमें आठ कोनों वाली अहोई देवी का चित्र और साही का चित्र) बनाया जाता है। इसे चावल या गेहूं के आटे से भी बनाया जा सकता है। साथ ही, एक मिट्टी का घड़ा भी पूजा में रखा जाता है, जिसमें पानी भरा जाता है। पूजा सामग्री:पूजा के लिए कलश, रोली, अक्षत (चावल), फूल, दूध, मिठाई, पान, सुपारी, फल, और चांदी या मिट्टी की स्याही की प्रतिमा ली जाती है। पूजन विधि:शाम के समय माताएं अहोई माता की पूजा करती हैं। अहोई माता की तस्वीर के सामने दीप जलाकर उनकी आरती की जाती है। महिलाएं अपने बच्चों के नाम लेकर माता से उनकी लंबी आयु और समृद्धि की प्रार्थना करती हैं। साथ ही, स्याही की प्रतिमा को भी पूजती हैं। तारों को देखकर व्रत का समापन:रात को आकाश में तारे देखने के बाद व्रत का समापन किया जाता है। कुछ स्थानों पर महिलाएं तारों को अर्घ्य देकर पूजा करती हैं, जबकि कुछ स्थानों पर चंद्रमा को देखकर व्रत तोड़ा जाता है। व्रत की समाप्ति: पूजा के बाद व्रतधारी महिलाएं अपने परिवार के साथ भोजन करती हैं। व्रत के अंत में सास या परिवार की अन्य बुजुर्ग महिलाओं को वस्त्र और अन्य उपहार दिए जाते हैं। अहोई अष्टमी का व्रत माताओं की अपने बच्चों के प्रति असीम प्रेम और भक्ति को दर्शाता है।

आगामी अहोई अष्टमी की तिथियाँ
  • 01 नवंबर 2026, रविवर
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