30 Nov 2025 आध्यात्मिक मार्गदर्शन विश्वसनीय जानकारी

करवा चौथ

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करवा चौथ एक महत्वपूर्ण हिंदू त्योहार है, जो विशेष रूप से विवाहित महिलाओं द्वारा अपने पति की लंबी उम्र और सुखद दांपत्य जीवन के लिए मनाया जाता है। यह त्योहार भारत के उत्तरी भागों, विशेषकर पंजाब, हरियाणा, उत्तर प्रदेश, राजस्थान, और मध्य प्रदेश में बड़े उत्साह और श्रद्धा के साथ मनाया जाता है।

करवा चौथ का महत्व

करवा चौथ का धार्मिक और सांस्कृतिक महत्व बहुत गहरा है। इस दिन विवाहित महिलाएँ पूरे दिन निर्जला व्रत (बिना पानी और भोजन के) रखती हैं और रात को चंद्रमा की पूजा करने के बाद ही अपना व्रत तोड़ती हैं। यह व्रत पति की लंबी उम्र, अच्छे स्वास्थ्य और सुखद वैवाहिक जीवन के लिए किया जाता है। इस त्योहार का सामाजिक महत्व भी है, क्योंकि यह विवाह में प्रेम, समर्पण, और परस्पर सहयोग को प्रकट करता है।

करवा चौथ की कथा

करवा चौथ की पौराणिक कथा कई संस्करणों में सुनाई जाती है, लेकिन सबसे प्रसिद्ध कथा वीरवती नाम की एक सुंदर रानी से जुड़ी है। कथा इस प्रकार है: एक समय की बात है, वीरवती नाम की एक सुंदर और धर्मपरायण महिला थी। वह सात भाइयों की अकेली बहन थी और उसका विवाह एक राजा से हुआ था। शादी के बाद, वीरवती ने अपने पहले करवा चौथ का व्रत रखा। वह दिनभर भूखी-प्यासी रहकर व्रत का पालन कर रही थी, लेकिन जैसे-जैसे दिन बीतता गया, वह भूख और प्यास से अत्यधिक कमजोर हो गई। उसकी यह हालत देखकर उसके भाइयों को उससे बहुत चिंता हुई। भाइयों ने अपनी बहन को व्रत तोड़ने के लिए मनाने की कोशिश की, लेकिन वीरवती ने चंद्रमा के दर्शन किए बिना व्रत तोड़ने से इनकार कर दिया। भाइयों ने अपनी बहन की हालत देखकर एक योजना बनाई। उन्होंने एक पेड़ पर दीप जलाकर ऐसा दिखाया मानो चंद्रमा उदय हो गया हो। वीरवती ने अपने भाइयों की बात मानकर उस नकली चंद्रमा को देखकर व्रत तोड़ लिया। व्रत तोड़ते ही उसके पति की अचानक मृत्यु हो गई। यह देखकर वीरवती बहुत दुखी हुई और उसने पश्चाताप करना शुरू किया। उसके समर्पण और पश्चाताप से देवी माता प्रसन्न हुईं और उसे अपने व्रत की गलती का एहसास हुआ। देवी ने उसे बताया कि उसने नकली चंद्रमा देखकर व्रत तोड़ा था, जिससे उसके पति की मृत्यु हो गई। वीरवती ने दृढ़ संकल्प लिया और पूरे साल दुर्गा मां की भक्ति करते हुए सच्चे मन से करवा चौथ का व्रत रखा। अगले वर्ष, करवा चौथ के दिन उसके समर्पण से देवी प्रसन्न हुईं और उसके पति को पुनः जीवित कर दिया। तब से करवा चौथ का व्रत पति की लंबी आयु और सुरक्षा के लिए रखा जाने लगा। इस कथा से यह संदेश मिलता है कि पति-पत्नी के बीच प्रेम और विश्वास के साथ किया गया व्रत देवी-देवताओं की कृपा से सदा फलदायी होता है।

करवा चौथ का व्रत और पूजा विधि

करवा चौथ व्रत की पूजा विधि इस प्रकार है: व्रत की तैयारी:व्रत से एक दिन पहले महिलाएं अपने ससुराल या मायके से करवा चौथ के लिए विशेष सामग्री प्राप्त करती हैं, जिसे "सर्गी" कहा जाता है। सर्गी में सूखे मेवे, मिठाइयाँ, और अन्य खाद्य पदार्थ होते हैं, जो सूर्योदय से पहले खाए जाते हैं। पूजा की तैयारी: करवा चौथ के पावन अवसर पर महिलाएं सोलह श्रृंगार करती हैं, जो उनके सौभाग्य और पति के प्रति प्रेम का प्रतीक होता है। इस दिन वे विशेष रूप से सज-धजकर तैयार होती हैं और करवा (मिट्टी का बर्तन) में पानी भरकर उसकी पूजा करती हैं। पूजा की थाली में गेंहू, चावल, हल्दी, कुमकुम, और फूलों का विशेष महत्व होता है, जिनका उपयोग विधिपूर्वक किया जाता है। पूजा के दौरान करवा चौथ की पौराणिक कथा सुनी जाती है, जिसमें पति की लंबी आयु और सुखद वैवाहिक जीवन के लिए प्रार्थना की जाती है। सभी महिलाएं मिलकर सामूहिक रूप से यह पूजा करती हैं, जो इस त्योहार की सामाजिक और सांस्कृतिक विशेषता को दर्शाता है। चंद्रमा की पूजा:जब रात को चंद्रमा उदय होता है, तो करवा चौथ के व्रत का सबसे महत्वपूर्ण क्षण आता है। महिलाएं छलनी के माध्यम से चंद्रमा को देखती हैं, जो शुद्धता और समर्पण का प्रतीक माना जाता है। चंद्र दर्शन के बाद वे अपने पति की लंबी उम्र, अच्छे स्वास्थ्य और सुखमय जीवन के लिए प्रार्थना करती हैं। इसके बाद, पति अपनी पत्नी को पानी पिलाते हैं, जिससे उसका व्रत टूटता है। यह क्षण पति-पत्नी के बीच प्रेम, विश्वास और समर्पण का गहरा प्रतीक होता है, जो करवा चौथ की आध्यात्मिक और सांस्कृतिक महत्ता को दर्शाता है।

करवा चौथ के अनुष्ठान और परंपराएँ

सोलह श्रृंगार: इस दिन महिलाएँ सोलह श्रृंगार करती हैं, जिसमें बिंदी, सिंदूर, चूड़ियाँ, मेहंदी, और अन्य आभूषण शामिल होते हैं। इसे स्त्री के सौभाग्य का प्रतीक माना जाता है। मेहंदी रचाना: करवा चौथ के एक दिन पहले महिलाएं अपने हाथों में मेहंदी लगाती हैं। मेहंदी का रंग जितना गहरा होता है, माना जाता है कि उनके पति उनसे उतना ही अधिक प्यार करते हैं। सर्गी का भोजन: व्रत से पहले सुबह सूर्योदय से पहले महिलाएं सर्गी खाती हैं, जो उनकी सास द्वारा दी जाती है। यह व्रत रखने में सहायता करता है, क्योंकि सर्गी में ऐसे खाद्य पदार्थ होते हैं जो पूरे दिन ऊर्जा प्रदान करते हैं। व्रत की कथा सुनना: पूजा के दौरान करवा चौथ की पौराणिक कथा सुनना अनिवार्य होता है। इस कथा में देवी पार्वती, भगवान शिव, और वीरवती की कथा प्रमुख होती है।

आधुनिक समय में करवा चौथ

हालांकि यह त्योहार पारंपरिक रूप से विवाहित महिलाओं द्वारा मनाया जाता था, आजकल कई जगहों पर पुरुष भी अपनी पत्नियों के साथ यह व्रत रखते हैं, ताकि दोनों एक-दूसरे की लंबी उम्र और स्वास्थ्य के लिए प्रार्थना कर सकें। इसके अलावा, करवा चौथ एक सामाजिक और सांस्कृतिक समारोह बन गया है, जहाँ महिलाएं एक साथ मिलकर व्रत करती हैं, और उनके सोलह श्रृंगार और परंपराएँ इस दिन को विशेष बना देती हैं। करवा चौथ विवाहित महिलाओं के लिए अपने पति के प्रति प्रेम और समर्पण का प्रतीक है। यह व्रत न केवल धार्मिक और सांस्कृतिक महत्व रखता है, बल्कि वैवाहिक जीवन में विश्वास और समर्पण को बढ़ावा देता है। करवा चौथ की पूजा और व्रत एक सामाजिक उत्सव भी है, जो महिलाओं के जीवन में ख़ुशियाँ और समर्पण लेकर आता है।

आगामी करवा चौथ की तिथियाँ
  • 29 अक्टूबर 2026, गुरुवर
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