30 Nov 2025 आध्यात्मिक मार्गदर्शन विश्वसनीय जानकारी

मीराबाई

mirabai

मीराबाई (1498-1547) भारतीय इतिहास की सबसे महान भक्ति कवयित्रियों में से एक थीं। वे राजस्थान के मेवाड़ की राजकुमारी थीं, लेकिन उनका जीवन और उनकी भक्ति कृष्ण को समर्पित थी। मीराबाई को भगवान कृष्ण के प्रति उनके अटूट प्रेम और भक्ति के लिए जाना जाता है। उनकी कविताओं और भजनों में प्रेम, भक्ति, समर्पण, और ईश्वर के प्रति अनन्य निष्ठा की गहराई को अनुभव किया जा सकता है।

मीराबाई का जीवन

जन्म और प्रारंभिक जीवन मीराबाई का जन्म 1498 में राजस्थान के मेड़ता में हुआ था। वे रतन सिंह राठौड़ की बेटी थीं, जो एक राजपूत राजा थे। बाल्यकाल से ही मीराबाई भगवान कृष्ण की भक्ति में डूबी रहती थीं। कहा जाता है कि जब वे बहुत छोटी थीं, तब उन्होंने भगवान कृष्ण की मूर्ति को अपना पति मान लिया था। विवाह मीराबाई का विवाह मेवाड़ के राजा भोजराज से हुआ था, जो महाराणा सांगा के पुत्र थे। हालांकि, विवाह के बाद भी मीराबाई का मन भगवान कृष्ण में ही रमा रहता था। विवाह के कुछ समय बाद ही उनके पति की मृत्यु हो गई, लेकिन इस कठिन समय में भी मीराबाई ने अपनी भक्ति और भगवान कृष्ण के प्रति प्रेम को कभी नहीं छोड़ा। परिवार से संघर्ष मीराबाई की भक्ति को उनके ससुराल वालों ने स्वीकार नहीं किया। उन्होंने मीराबाई को कई बार ईश्वर की भक्ति छोड़ने और एक राजकुमारी की तरह जीवन जीने के लिए बाध्य किया, लेकिन मीराबाई ने अपने ईश्वर-प्रेम को नहीं छोड़ा। उनके परिवार ने मीराबाई को कई बार मारने की कोशिश की, लेकिन हर बार भगवान कृष्ण ने उन्हें बचा लिया। भक्ति और संतों के साथ संगति मीराबाई ने समाज और परिवार की परवाह किए बिना भगवान कृष्ण की भक्ति में अपना जीवन समर्पित कर दिया। वे संत रविदास के शिष्य मंडल में भी शामिल हुईं, जिनसे उन्होंने भक्ति का गहरा मार्गदर्शन प्राप्त किया। मीराबाई का जीवन त्याग, प्रेम, और भक्ति का आदर्श उदाहरण है। उन्होंने सांसारिक जीवन से मोह छोड़कर भगवान कृष्ण की भक्ति में स्वयं को पूर्णत समर्पित कर दिया।

मीराबाई की भक्ति और काव्य

कृष्ण के प्रति अनन्य प्रेम मीराबाई का समर्पण और प्रेम भगवान कृष्ण के प्रति अद्वितीय था। वे श्रीकृष्ण को अपना पति, प्रेमी, और मित्र मानती थीं। उनके भजनों में कृष्ण के प्रति गहरा प्रेम, अनुराग, और समर्पण व्यक्त होता है। भजनों में ईश्वर के प्रति समर्पण मीराबाई के भजन और कविताएँ भगवान कृष्ण के प्रति उनके गहरे प्रेम का प्रमाण हैं। उनके भजनों में वे कहती हैं कि उनके जीवन का हर क्षण और हर सांस केवल कृष्ण के लिए है। उनके कुछ प्रसिद्ध भजन हैं "पायो जी मैंने राम रतन धन पायो" "मीरा के प्रभु गिरधर नागर" "माई री, मैं तो लियो गोविंद मोल" साधना और त्याग मीराबाई ने सांसारिक सुखों और राजसी जीवन का त्याग कर दिया था और जीवन के अंतिम समय तक कृष्ण भक्ति में डूबी रहीं। वे अक्सर मंदिरों और तीर्थस्थानों की यात्रा करती थीं और संतों के साथ भक्ति में लीन रहती थीं। मीराबाई का काव्य और साहित्यिक योगदान मीराबाई की कविताएँ भक्ति साहित्य का अमूल्य हिस्सा मानी जाती हैं। उनकी रचनाओं में भगवान कृष्ण के प्रति असीम प्रेम और आत्मसमर्पण की झलक मिलती है। उन्होंने अपनी कविताओं के माध्यम से उस समय के सामाजिक बंधनों को चुनौती दी और भक्ति मार्ग का प्रचार किया।

मीराबाई का योगदान

भक्ति आंदोलन में योगदान मीराबाई का योगदान भक्ति आंदोलन में अद्वितीय है। उन्होंने अपने जीवन को प्रेम और भक्ति के मार्ग पर पूरी तरह समर्पित कर दिया और समाज में धार्मिक और सामाजिक सुधार लाने का प्रयास किया। समाज में स्त्रियों की भूमिका मीराबाई ने उस समय की सामाजिक व्यवस्था और स्त्रियों की सीमाओं को तोड़ा। वे एक रानी होते हुए भी खुलेआम भक्ति और प्रेम की बात करती थीं। उनके जीवन ने यह सिखाया कि भक्ति के मार्ग पर कोई भी व्यक्ति, चाहे वह स्त्री हो या पुरुष, ईश्वर को प्राप्त कर सकता है। संतों के साथ संगति मीराबाई का संपर्क अन्य संतों जैसे संत रविदास, तुलसीदास, और सूरदास के साथ भी था। उन्होंने भक्ति मार्ग पर चलते हुए संतों के साथ जीवन बिताया और उनकी शिक्षाओं को आत्मसात किया।

मीराबाई का अंतिम समय

मीराबाई ने अपने जीवन के अंतिम समय में द्वारका और वृंदावन का रुख किया। कहा जाता है कि उन्होंने अपनी अंतिम सांस वृंदावन में भगवान कृष्ण के चरणों में ली। उनके जीवन के अंत के बारे में कई कथाएँ हैं, लेकिन सभी इस बात पर सहमत हैं कि मीराबाई ने कृष्ण में अपना संपूर्ण अस्तित्व विलीन कर दिया।

मीराबाई की शिक्षा

मीराबाई का जीवन एक अद्वितीय उदाहरण है कि कैसे भक्ति और प्रेम के माध्यम से ईश्वर को प्राप्त किया जा सकता है। उनके भजन और कविताएँ आज भी लोगों को भक्ति के मार्ग पर चलने के लिए प्रेरित करती हैं। उनका जीवन यह संदेश देता है कि जब कोई व्यक्ति ईश्वर के प्रति पूर्ण समर्पित हो जाता है, तो संसार की कोई भी बाधा उसे रोक नहीं सकती।

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