“निशंक होई रे मना, निर्भय होई रे मना” स्वामी समर्थ महाराज की भक्ति और श्रद्धा से जुड़ा एक लोकप्रिय मराठी भजन है। इस भजन में भक्त को भय और चिंता छोड़कर श्री स्वामी समर्थ पर पूर्ण विश्वास रखने का संदेश दिया गया है। इसकी मुख्य पंक्ति “अशक्य ही शक्य करतील स्वामी” भक्त के मन में विश्वास, धैर्य और आशा उत्पन्न करती है।
निशंक होई रे मना – संपूर्ण भजन
निशंक होई रे मना,
निर्भय होई रे मना।
प्रचंड स्वामीबळ पाठीशी,
नित्य आहे रे मना।
अतर्क्य अवधूत हे स्मर्तुगामी,
अशक्य ही शक्य करतील स्वामी।।१।।
जिथे स्वामीचरण तिथे न्युन्य काय,
स्वये भक्त प्रारब्ध घडवी ही माय।
आज्ञेवीना काळ ही ना नेई त्याला,
परलोकी ही ना भीती तयाला
अशक्य ही शक्य करतील स्वामी।।२।।
उगाची भितोसी भय हे पळु दे,
वसे अंतरी ही स्वामीशक्ति कळु दे।
जगी जन्म मृत्यु असे खेळ ज्यांचा,
नको घाबरू तू असे बाळ त्यांचा
अशक्य ही शक्य करतील स्वामी।।३।।
खरा होई जागा श्रद्धेसहित,
कसा होसी त्याविण तू स्वामिभक्त।
आठव! कितीदा दिली त्यांनीच साथ,
नको डगमगु स्वामी देतील हात
अशक्य ही शक्य करतील स्वामी।।४।।
विभूति नमननाम ध्यानार्दी तीर्थ,
स्वामीच या पंचामृतात।
हे तीर्थ घेइ आठवी रे प्रचिती,
ना सोडती तया, जया स्वामी घेती हाती।।५।।
भजन का सरल हिंदी अर्थ
हे मेरे मन! निडर और निर्भय बन। तुम्हारे पीछे स्वामी समर्थ की अपार शक्ति है, इसलिए व्यर्थ भयभीत मत हो। स्वामी समर्थ अवधूत स्वरूप हैं और अपने भक्तों के स्मरण मात्र से उनके पास पहुंचने वाले माने जाते हैं। उनकी कृपा से असंभव कार्य भी संभव हो सकते हैं।
जहां स्वामी समर्थ के चरणों का आश्रय है, वहां किसी चीज की कमी नहीं रहती। भक्त के जीवन और उसके प्रारब्ध को भी स्वामी अपनी कृपा से बदल सकते हैं। जब तक उनकी इच्छा न हो, समय या मृत्यु भी भक्त को अपने अधीन नहीं कर सकती—यह पंक्तियां स्वामी समर्थ के प्रति भक्त की पूर्ण शरणागति और विश्वास को व्यक्त करती हैं।
भय छोड़कर स्वामी समर्थ पर विश्वास
भजन भक्त के मन से अनावश्यक भय निकालने का संदेश देता है। जीवन में जन्म और मृत्यु का चक्र चलता रहता है, लेकिन जो स्वयं को स्वामी समर्थ की शरण में समर्पित करता है, उसे भय के स्थान पर विश्वास और धैर्य रखना चाहिए।
“उगाची भितोसी भय हे पळु दे” का भाव है कि बिना कारण डरते रहने की आवश्यकता नहीं है। अपने भीतर स्वामी की शक्ति को अनुभव करने और कठिन परिस्थितियों में भी विश्वास बनाए रखने का प्रयास करना चाहिए।
श्रद्धा का महत्व
इस भजन में स्वामी भक्ति के लिए श्रद्धा को अत्यंत महत्वपूर्ण बताया गया है। केवल स्वयं को भक्त कहना पर्याप्त नहीं, बल्कि मन में सच्ची श्रद्धा और विश्वास होना आवश्यक है। भक्त को अपने जीवन में उन अवसरों को याद करना चाहिए जब उसे कठिन समय में सहायता, साहस या मार्गदर्शन मिला।
“नको डगमगु स्वामी देतील हात” का भाव भक्त को आश्वस्त करता है कि कठिन समय में स्वामी समर्थ का स्मरण करते हुए मन को स्थिर रखना चाहिए और निराश नहीं होना चाहिए।
“अशक्य ही शक्य करतील स्वामी” का भाव
भजन की सबसे प्रसिद्ध पंक्ति “अशक्य ही शक्य करतील स्वामी” है। इसका भाव है कि भक्त को परिस्थितियों से हार नहीं माननी चाहिए। ईश्वर पर विश्वास, धैर्य, उचित प्रयास और सकारात्मक दृष्टिकोण के साथ कठिन से कठिन परिस्थिति का सामना किया जा सकता है।
यह पंक्ति स्वामी समर्थ की कृपा और भक्त के विश्वास का प्रतीक बन गई है। स्वामी भक्ति में इसे आशा और आत्मबल देने वाले संदेश के रूप में स्मरण किया जाता है।
स्वामी समर्थ और पंचामृत का भाव
अंतिम चरण में विभूति, नमन, नामस्मरण, ध्यान और तीर्थ जैसे भक्ति के साधनों का उल्लेख किया गया है। भजन में स्वामी को ही इस आध्यात्मिक “पंचामृत” का सार माना गया है। भक्त को इन साधनों के माध्यम से स्वामी समर्थ का स्मरण और उनकी अनुभूति करने की प्रेरणा दी जाती है।
अंतिम पंक्तियों में पूर्ण शरणागति का भाव है—जिसे स्वामी अपने हाथों में ले लेते हैं, उसे वे अकेला नहीं छोड़ते। यह भक्त के अटूट विश्वास और समर्पण को दर्शाता है।
भजन का आध्यात्मिक संदेश
- व्यर्थ के भय को छोड़कर आत्मविश्वास बनाए रखें।
- स्वामी समर्थ के प्रति श्रद्धा और विश्वास रखें।
- कठिन परिस्थितियों में धैर्य न खोएं।
- नामस्मरण और ध्यान को जीवन का हिस्सा बनाएं।
- ईश्वर पर विश्वास के साथ अपने कर्तव्यों और प्रयासों को जारी रखें।
- निराशा के स्थान पर आशा और सकारात्मकता को महत्व दें।
“निशंक होई रे मना” का पाठ कब करें?
यह भजन स्वामी समर्थ की पूजा, भजन-कीर्तन, सत्संग और व्यक्तिगत साधना के समय गाया या पढ़ा जा सकता है। विशेष रूप से जब मन में भय, चिंता या असमंजस हो, तब भक्त इसे स्वामी समर्थ के स्मरण और आत्मबल के लिए गा सकते हैं।
स्वामी समर्थ भक्ति में नामस्मरण
स्वामी समर्थ की भक्ति परंपरा में नामस्मरण और गुरु के प्रति श्रद्धा को महत्वपूर्ण स्थान प्राप्त है। “श्री स्वामी समर्थ” नाम का स्मरण भक्त को ईश्वर के प्रति अपने विश्वास और समर्पण से जोड़ता है। इस भजन में भी बार-बार स्वामी समर्थ की शक्ति और कृपा का स्मरण कराया गया है।
निष्कर्ष
“निशंक होई रे मना, निर्भय होई रे मना” केवल एक भक्ति गीत नहीं, बल्कि भय के समय मन को धैर्य देने वाला आध्यात्मिक संदेश भी है। यह भक्त को स्वामी समर्थ पर विश्वास रखने, कठिन परिस्थितियों में न डगमगाने और श्रद्धा के साथ आगे बढ़ने की प्रेरणा देता है।
अशक्य ही शक्य करतील स्वामी। श्री स्वामी समर्थ।