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अष्टलक्ष्मी स्तोत्र – माँ लक्ष्मी के आठ स्वरूपों की आराधना

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अष्टलक्ष्मी स्तोत्र – माँ लक्ष्मी के आठ स्वरूपों की आराधना

अष्टलक्ष्मी स्तोत्र माँ लक्ष्मी के आठ दिव्य स्वरूपों की उपासना का एक प्रसिद्ध स्तोत्र है। हिंदू धर्म में माँ लक्ष्मी को धन, समृद्धि, सौभाग्य, ऐश्वर्य और सुख-शांति की देवी माना जाता है। अष्टलक्ष्मी के आठ स्वरूप जीवन के अलग-अलग क्षेत्रों में सुख, समृद्धि और मंगल प्रदान करने वाले माने जाते हैं।

अष्टलक्ष्मी स्तोत्र का श्रद्धापूर्वक पाठ करने से साधक माँ लक्ष्मी के आठों स्वरूपों का स्मरण करता है। विशेष रूप से शुक्रवार, दीपावली, लक्ष्मी पूजन तथा नियमित लक्ष्मी उपासना के समय इसका पाठ शुभ माना जाता है।

इस स्तोत्र की रचना श्री वैष्णव परंपरा के विद्वान यू. वी. श्रीनिवास वरदाचार्य ने सन् १९७० के दशक के आरंभ में चेन्नई में की थी। सन् १९८० के दशक में ऑडियो कैसेटों के माध्यम से यह स्तोत्र पूरे भारत में फैला और आज यह लक्ष्मी‑उपासना का एक अनिवार्य अंग बन चुका है।

स्तोत्र में कुल आठ श्लोक हैं (कुछ संस्करणों में नौवाँ श्लोक भी मिलता है)। प्रत्येक श्लोक लक्ष्मी के एक विशेष स्वरूप की स्तुति करता है।

अष्टलक्ष्मी के आठ स्वरूप

अष्टलक्ष्मी के प्रमुख आठ स्वरूप इस प्रकार माने जाते हैं—

  1. आदि लक्ष्मी – मूल शक्ति, आध्यात्मिक शांति और सुख की देवी।

  2. धान्य लक्ष्मी – अन्न, कृषि और खाद्य समृद्धि की देवी।

  3. धैर्य लक्ष्मी – साहस, धैर्य और आत्मविश्वास प्रदान करने वाली देवी।

  4. गज लक्ष्मी – राजसी वैभव, सम्मान और ऐश्वर्य का प्रतीक स्वरूप।

  5. संतान लक्ष्मी – संतान सुख और परिवार की मंगलकामना से संबंधित स्वरूप।

  6. विजय लक्ष्मी – सफलता, विजय और जीवन में बाधाओं पर जीत का स्वरूप।

  7. विद्या लक्ष्मी – ज्ञान, शिक्षा, बुद्धि और विवेक की देवी।

  8. धन लक्ष्मी – धन, संपत्ति और आर्थिक समृद्धि का स्वरूप।


पूर्ण अष्टलक्ष्मी स्तोत्र – संस्कृत मूल एवं हिंदी भावार्थ

ॐ श्री अष्टलक्ष्मी नमः

१. आदि लक्ष्मी (मूल लक्ष्मी – मोक्षदायिनी)

संस्कृत मूल –
सुमनसवन्दित सुन्दरि माधवि, चन्द्र सहोदरि हेममये ।
मुनिगण वन्दित मोक्षप्रदायिनि, मञ्जुल भाषिणि वेदनुते ॥
पङ्कजवासिनि देव सुपूजित, सद्गुण वर्षिणि शान्तियुते ।
जय जय हे मधुसूदनकामिनि, आदिलक्ष्मि सदा पालय माम् ॥

हिंदी भावार्थ –
हे आदि लक्ष्मी! आप सज्जनों द्वारा स्तुत हैं, सुंदरी हैं, भगवान माधव (विष्णु) की प्रिया हैं, चंद्रमा की बहन हैं और स्वर्णमयी हैं। मुनिगण आपको नमन करते हैं, आप मोक्ष प्रदान करती हैं, आपकी वाणी मधुर है और वेद आपकी महिमा गाते हैं। आप कमल में निवास करती हैं, देवताओं द्वारा पूजित हैं, सद्गुणों की वर्षा करती हैं तथा शांतिस्वरूपा हैं। हे मधुसूदन (विष्णु) की प्रिये, आपकी जय हो! आदि लक्ष्मी, सदा मेरी रक्षा करें।



२. धान्य लक्ष्मी (अन्न‑समृद्धि)

संस्कृत मूल –
अयि कलिकल्मषनाशिनि कामिनि, वैदिकरूपिणि वेदमये ।
क्षीरसमुद्भव मङ्गलरूपिणि, मन्त्रनिवासिनि मन्त्रनुते ॥
मङ्गलदायिनि अम्बुजवासिनि, देवगणाश्रित पादयुते ।
जय जय हे मधुसूदनकामिनि, धान्यलक्ष्मि सदा पालय माम् ॥

हिंदी भावार्थ –
हे धान्य लक्ष्मी! आप कलियुग के पापों का नाश करने वाली हैं। आपका स्वरूप वैदिक विधानों के अनुसार है, आप स्वयं वेदमयी हैं। आप क्षीरसागर से प्रकट हुई और मंगलमयी हैं। आप मंत्रों में निवास करती हैं तथा मंत्रों द्वारा स्तुत होती हैं। आप मंगल (कल्याण) देने वाली, कमल में रहने वाली हैं और आपके चरणों में देवगण शरण लेते हैं। हे मधुसूदन की प्रिये, आपकी जय हो! धान्य लक्ष्मी, सदा मेरी रक्षा करें।


३. धैर्य लक्ष्मी (साहस एवं बल)

संस्कृत मूल –
जय वरवर्णिनि वैष्णवि भार्गवि, मन्त्रस्वरूपिणि मन्त्रमये ।
सुरगणपूजित शीघ्रफलप्रद, ज्ञानविकासिनि शास्त्रनुते ॥
भवभयहारिणि पापविमोचनि, साधुजनाश्रित पादयुते ।
जय जय हे मधुसूदनकामिनि, धैर्यलक्ष्मि सदा पालय माम् ॥

हिंदी भावार्थ –
हे धैर्य लक्ष्मी! आप उत्तम वर्ण वाली, विष्णु की शक्ति तथा भृगु‑कुलोत्पन्ना हैं। आप मंत्रमयी हैं, देवता आपकी पूजा करते हैं, आप शीघ्र फल देने वाली हैं, ज्ञान का विकास करती हैं और शास्त्रों द्वारा स्तुत हैं। आप संसार‑भय को हरने वाली तथा पापों से मुक्त करने वाली हैं; सज्जन जन आपके चरणों का आश्रय लेते हैं। हे मधुसूदन की प्रिये, आपकी जय हो! धैर्य लक्ष्मी, सदा मेरी रक्षा करें।


४. गज लक्ष्मी (राजवैभव)

संस्कृत मूल –
जय जय दुर्गतिनाशिनि कामिनि, सर्वफलप्रद शास्त्रमये ।
रथगजतुरगपदादि समावृत, परिजनमण्डित लोकनुते ॥
हरिहर ब्रह्म सुपूजित सेवित, तापनिवारण पादयुते ।
जय जय हे मधुसूदनकामिनि, गजलक्ष्मि रूपेण पालय माम् ॥

हिंदी भावार्थ –
हे गज लक्ष्मी! आपकी जय‑जय हो, आप दुर्गति (बुरी स्थिति) का नाश करने वाली हैं। आप सभी फल प्रदान करती हैं तथा शास्त्रमयी हैं। आप रथ, हाथी, घोड़े और पैदल सेना से घिरी हुई हैं, आपके अनुचर आपको मंडित करते हैं और समस्त लोक आपकी स्तुति करते हैं। हरि, हर (शिव) और ब्रह्मा आपकी सेवा तथा पूजा करते हैं; आपके चरण ताप (कष्ट) को दूर करते हैं। हे मधुसूदन की प्रिये, आपकी जय हो! कृपया गज लक्ष्मी के रूप में मेरी रक्षा करें।


५. सन्तान लक्ष्मी (संतान सुख)

संस्कृत मूल –
अयि खगवाहिनि मोहिनि चक्रिणि, रागविवर्धिनि ज्ञानमये ।
गुणगणवारिधि लोकहितैषिणि, स्वरसप्तभूषित गाननुते ॥
सकल सुरासुर देवमुनीश्वर, मानव वन्दित पादयुते ।
जय जय हे मधुसूदनकामिनि, सन्तानलक्ष्मि सदा पालय माम् ॥

हिंदी भावार्थ –
हे सन्तान लक्ष्मी! आप गरुड़ (पक्षी) पर सवार हैं, मोहिनी हैं, चक्रधारिणी हैं, प्रेम‑भाव को बढ़ाने वाली तथा ज्ञानमयी हैं। आप गुणों के समुद्र हैं, लोक‑कल्याण की इच्छा रखती हैं; आपका गान सात स्वरों से सुशोभित है। सभी देवता, असुर, ऋषि‑मुनि तथा मानव आपके चरणों को नमन करते हैं। हे मधुसूदन की प्रिये, आपकी जय हो! सन्तान लक्ष्मी, सदा मेरी रक्षा करें।


६. विजय लक्ष्मी (विजय – सफलता)

संस्कृत मूल –
जय कमलासनि सद्गतिदायिनि, ज्ञानविकासिनि गानमये ।
अनुदिनमर्चित कुङ्कुमधूसरभूषित, वासित वाद्यनुते ॥
कनकधरास्तुति वैभव वन्दित, शङ्कर देशिक मान्यपदे ।
जय जय हे मधुसूदनकामिनि, विजयलक्ष्मी सदा पालय माम् ॥

हिंदी भावार्थ –
हे विजय लक्ष्मी! आप कमलासन पर विराजमान हैं, सद्गति (मुक्ति) देने वाली हैं, ज्ञान का विकास करती हैं तथा गानमयी हैं। प्रतिदिन कुंकुम और सुगंधित द्रव्यों से आपकी पूजा होती है तथा वाद्य‑संगीत से आपकी स्तुति की जाती है। धन की देवी (कनकधरा) की स्तुति से आपका वैभव बढ़ता है; आप शंकराचार्य जैसे गुरुओं के भी पूज्य पद हैं। हे मधुसूदन की प्रिये, आपकी जय हो! विजय लक्ष्मी, सदा मेरी रक्षा करें।


७. विद्या लक्ष्मी (ज्ञान – विद्या)

संस्कृत मूल –
प्रणत सुरेश्वरि भारति भार्गवि, शोकविनाशिनि रत्नमये ।
मणिमय भूषित कर्णविभूषण, शान्ति समावृत हास्यमुखे ॥
नवनिधि दायिनि कलिमलहारिणि, काम्यफलप्रद हस्तयुते ।
जय जय हे मधुसूदनकामिनि, विद्यालक्ष्मि सदा पालय माम् ॥

हिंदी भावार्थ –
हे विद्या लक्ष्मी! देवता आपको नमन करते हैं, आप भारती (सरस्वती) की तरह ज्ञानप्रद हैं, भृगुकुलोत्पन्न हैं, शोक दूर करने वाली तथा रत्नमयी हैं। आप मणियों से सुशोभित कर्ण‑आभूषण धारण करती हैं, आपका मुख शांति और मुसकान से भरा है। आप नौ निधियाँ प्रदान करती हैं, कलियुग के मल (पाप) को दूर करती हैं और आपके हाथ सभी मनोवांछित फल देने वाले हैं। हे मधुसूदन की प्रिये, आपकी जय हो! विद्या लक्ष्मी, सदा मेरी रक्षा करें।


८. धन लक्ष्मी (आर्थिक समृद्धि)

संस्कृत मूल –
धिमिधिमि धिन्धिमि धिन्धिमि धिन्धिमि, धुन्धुभि नाद सुपूर्णमये ।
धुमधुम धुन्धुम धुन्धुम धुन्धुम, शङ्ख निनाद सुवाद्यनुते ॥
वेद पुराणेतिहास सुपूजित, वैदिकमार्ग प्रदर्शयुते ।
जय जय हे मधुसूदनकामिनि, धनलक्ष्मि सदा पालय माम् ॥

हिंदी भावार्थ –
हे धन लक्ष्मी! आप ढोल, नगाड़ों तथा शंख की ध्वनि से पूर्ण हैं – ‘धिमिधिमि’ और ‘धुमधुम’ की गूँज आपके वैभव को प्रकट करती है। वेद, पुराण और इतिहास आपकी पूजा करते हैं; आप वैदिक मार्ग का प्रदर्शन करने वाली हैं। हे मधुसूदन की प्रिये, आपकी जय हो! धन लक्ष्मी, सदा मेरी रक्षा करें।


अष्टलक्ष्मी स्तोत्र का महत्व

अष्टलक्ष्मी स्तोत्र में माँ लक्ष्मी के विभिन्न स्वरूपों का गुणगान किया जाता है। मान्यता है कि श्रद्धा और नियमितता से स्तोत्र का पाठ करने से घर में सकारात्मक वातावरण, सुख-शांति और समृद्धि की भावना बढ़ती है।

यह स्तोत्र केवल भौतिक धन की प्राप्ति तक सीमित नहीं माना जाता, बल्कि ज्ञान, धैर्य, विजय, अन्न, संतान, ऐश्वर्य और आध्यात्मिक संतोष जैसे जीवन के विभिन्न पक्षों की समृद्धि का भी स्मरण कराता है।

अष्टलक्ष्मी स्तोत्र का पाठ कब करें?

अष्टलक्ष्मी स्तोत्र का पाठ विशेष रूप से इन अवसरों पर किया जा सकता है—

  • शुक्रवार के दिन

  • दीपावली और लक्ष्मी पूजन के अवसर पर

  • शुक्ल पक्ष के शुक्रवार को

  • प्रातःकाल स्नान के बाद

  • संध्या के समय दीप प्रज्वलित करके

  • नियमित लक्ष्मी उपासना के दौरान

अष्टलक्ष्मी स्तोत्र पाठ विधि

सबसे पहले पूजा स्थान को स्वच्छ करके माँ लक्ष्मी की प्रतिमा या चित्र स्थापित करें। घी का दीपक जलाएं और पुष्प, अक्षत तथा नैवेद्य अर्पित करें। इसके बाद शांत मन से माँ लक्ष्मी का ध्यान करें और अष्टलक्ष्मी स्तोत्र का पाठ करें।

पाठ के दौरान मन को एकाग्र रखें और अपनी श्रद्धा के अनुसार माँ लक्ष्मी से सुख, शांति, सद्बुद्धि और समृद्धि की प्रार्थना करें। पाठ के अंत में माँ लक्ष्मी की आरती करके प्रसाद अर्पित किया जा सकता है।

अष्टलक्ष्मी स्तोत्र के पाठ से मिलने वाले पारंपरिक लाभ

धार्मिक मान्यताओं के अनुसार अष्टलक्ष्मी स्तोत्र का श्रद्धापूर्वक पाठ करने से—

  • घर में सुख-शांति की भावना बढ़ती है।

  • आर्थिक समृद्धि के लिए सकारात्मक संकल्प बनता है।

  • परिवार में मंगल और सौहार्द की कामना की जाती है।

  • ज्ञान और विवेक की प्राप्ति के लिए प्रार्थना की जाती है।

  • कठिन परिस्थितियों में धैर्य और साहस का स्मरण होता है।

  • कार्यों में सफलता और विजय की कामना की जाती है।

  • अन्न और जीवनोपयोगी संसाधनों की समृद्धि के लिए प्रार्थना की जाती है।

  • माँ लक्ष्मी के आठों स्वरूपों का एक साथ स्मरण होता है।

अष्टलक्ष्मी स्तोत्र और लक्ष्मी उपासना

अष्टलक्ष्मी स्तोत्र का मूल भाव यह है कि समृद्धि केवल धन तक सीमित नहीं है। स्वस्थ और सुखी जीवन के लिए अन्न, ज्ञान, साहस, संतान, विजय, ऐश्वर्य और आध्यात्मिक शांति भी आवश्यक हैं। इसलिए अष्टलक्ष्मी की उपासना जीवन के विभिन्न क्षेत्रों में संतुलित समृद्धि की कामना का प्रतीक मानी जाती है।

अष्टलक्ष्मी स्तोत्र माँ लक्ष्मी के आठ स्वरूपों की आराधना का सुंदर माध्यम है। श्रद्धा, भक्ति और सकारात्मक भावना के साथ इसका पाठ किया जा सकता है। शुक्रवार तथा दीपावली जैसे विशेष अवसरों पर अष्टलक्ष्मी का पूजन और स्तोत्र पाठ विशेष रूप से लोकप्रिय है। धार्मिक आस्था के अनुसार माँ लक्ष्मी की कृपा से जीवन में सुख, शांति, ऐश्वर्य और समृद्धि की प्राप्ति होती है।

सामान्य प्रश्न (FAQ)

प्रश्न १ – यह स्तोत्र किसने लिखा और कब?
उत्तर – इसकी रचना यू. वी. श्रीनिवास वरदाचार्य ने सन् १९७० के दशक में चेन्नई में की।

प्रश्न २ – ‘अष्टलक्ष्मी’ क्यों कहा जाता है?
उत्तर – ‘अष्ट’ का अर्थ है ‘आठ’। लक्ष्मी के आठ मुख्य स्वरूपों के कारण इसे अष्टलक्ष्मी कहते हैं, जो जीवन के आठ आयामों में समृद्धि प्रदान करते हैं।

प्रश्न ३ – क्या लक्ष्मी केवल धन देती हैं?
उत्तर – नहीं, लक्ष्मी का वास्तविक स्वरूप ‘समृद्धि’ है – जिसमें पैसा, अन्न, विद्या, स्वास्थ्य, संतान, साहस, विजय और मोक्ष सब सम्मिलित हैं।

प्रश्न ४ – क्या इस स्तोत्र का पाठ बिना दीक्षा के कर सकते हैं?
उत्तर – हाँ, यह स्तोत्र सर्वसाधारण के लिए है; किसी विशेष दीक्षा की आवश्यकता नहीं, केवल श्रद्धा और नियमपूर्वक पाठ करें।

प्रश्न ५ – क्या मासिक धर्म के दौरान इसका पाठ करना उचित है?
उत्तर – परंपरा के अनुसार, यदि आप शुद्धता का पालन करना चाहें तो उन दिनों मानसिक पाठ या श्रवण कर सकते हैं; स्पर्श या उच्चारण से बचना चाहिए – किंतु यह व्यक्तिगत आस्था पर निर्भर है।


ॐ श्री महालक्ष्म्यै नमः
अष्टलक्ष्मी स्तोत्र का नियमित पाठ करके अपने जीवन में हर प्रकार की समृद्धि और कल्याण को आमंत्रित करें।