देवी कवच जिसे दुर्गा कवच, चंडी कवच या श्री देव्याः कवचम् भी कहा जाता है, देवी उपासना का एक प्रसिद्ध रक्षात्मक स्तोत्र है। यह देवी माहात्म्य/दुर्गा सप्तशती की पाठ-परंपरा से संबंधित है और इसमें देवी के विभिन्न स्वरूपों से शरीर, दिशाओं, इंद्रियों, मन, प्राण, परिवार, धन, यात्रा तथा जीवन के विभिन्न पक्षों की रक्षा की प्रार्थना की गई है।
देवी कवच का आरंभ मार्कण्डेय ऋषि और ब्रह्माजी के संवाद से होता है। ब्रह्माजी देवी के इस पवित्र कवच का वर्णन करते हैं और आगे नवदुर्गा तथा देवी के अनेक मातृका स्वरूपों का स्मरण कराया जाता है।
परंपरागत रूप से देवी कवच, अर्गला स्तोत्र और कीलक स्तोत्र को दुर्गा सप्तशती के पाठ से पहले पढ़े जाने वाले महत्वपूर्ण अंगों में माना जाता है।
धार्मिक मान्यता: देवी कवच के लाभ आस्था और पारंपरिक साधना से जुड़े हैं। इन्हें किसी रोग या समस्या के वैज्ञानिक उपचार अथवा निश्चित परिणाम की गारंटी के रूप में नहीं लेना चाहिए।
देवी कवच का महत्व
‘कवच’ का सामान्य अर्थ रक्षा करने वाला आवरण या सुरक्षा कवच है। देवी कवच में भक्त अपने शरीर और जीवन के विभिन्न अंगों तथा क्षेत्रों की रक्षा के लिए देवी के अलग-अलग स्वरूपों का स्मरण करता है।
इसमें विशेष रूप से:
नवदुर्गा का स्मरण
मातृशक्तियों का वर्णन
दसों दिशाओं की रक्षा
शरीर के विभिन्न अंगों की रक्षा
मन, बुद्धि और अहंकार की रक्षा
पंचप्राणों की रक्षा
आयु, धर्म, यश और धन की रक्षा
परिवार एवं संतान की रक्षा
मार्ग और यात्रा की रक्षा
की प्रार्थना की गई है।
इस प्रकार देवी कवच का मूल भाव है—अपने संपूर्ण अस्तित्व को माँ भगवती की शरण में समर्पित करना और उनकी कृपा एवं संरक्षण की प्रार्थना करना।
॥ श्री देव्याः कवचम् ॥
विनियोग
ॐ अस्य श्रीचण्डीकवचस्य ब्रह्मा ऋषिः,
अनुष्टुप् छन्दः, चामुण्डा देवता,
अङ्गन्यासोक्तमातरो बीजम्, दिग्बन्धदेवतास्तत्त्वम्,
श्रीजगदम्बाप्रीत्यर्थे सप्तशतीपाठाङ्गत्वेन जपे विनियोगः।
ॐ नमश्चण्डिकायै॥
विनियोग का सरल अर्थ
इस श्री चंडी कवच के ऋषि ब्रह्माजी हैं, छंद अनुष्टुप् है और चामुंडा देवी इसकी अधिष्ठात्री देवता हैं। अंगन्यास में वर्णित मातृशक्तियाँ इसके बीज मानी गई हैं। देवी की प्रसन्नता और दुर्गा सप्तशती के पाठ के अंग के रूप में इस कवच का जप किया जाता है।
देवी कवच का संपूर्ण मूल संस्कृत पाठ
॥ मार्कण्डेय उवाच ॥
ॐ यद्गुह्यं परमं लोके सर्वरक्षाकरं नृणाम्।
यन्न कस्यचिदाख्यातं तन्मे ब्रूहि पितामह॥१॥
हिंदी अर्थ :मार्कण्डेय ऋषि ब्रह्माजी से कहते हैं—हे पितामह! संसार में जो परम गोपनीय और मनुष्यों की सभी प्रकार से रक्षा करने वाला साधन है, जिसे आपने अभी तक किसी को नहीं बताया है, वह मुझे बताइए।
॥ ब्रह्मोवाच ॥
अस्ति गुह्यतमं विप्र सर्वभूतोपकारकम्।
देव्यास्तु कवचं पुण्यं तच्छृणुष्व महामुने॥२॥
हिंदी अर्थ: ब्रह्माजी कहते हैं—हे विप्र! ऐसा अत्यंत गुप्त, पवित्र और सभी प्राणियों के कल्याण का साधन देवी का पवित्र कवच है। हे महामुने! अब इसका वर्णन सुनो।
नवदुर्गा का वर्णन
प्रथमं शैलपुत्री च द्वितीयं ब्रह्मचारिणी।
तृतीयं चन्द्रघण्टेति कूष्माण्डेति चतुर्थकम्॥३॥
हिंदी अर्थ: देवी के प्रथम स्वरूप का नाम शैलपुत्री, दूसरे का ब्रह्मचारिणी, तीसरे का चंद्रघंटा और चौथे का कूष्मांडा है।
पञ्चमं स्कन्दमातेति षष्ठं कात्यायनीति च।
सप्तमं कालरात्रीति महागौरीति चाष्टमम्॥४॥
हिंदी अर्थ :देवी का पाँचवाँ स्वरूप स्कंदमाता, छठा कात्यायनी, सातवाँ कालरात्रि और आठवाँ महागौरी कहलाता है।
नवमं सिद्धिदात्री च नवदुर्गाः प्रकीर्तिताः।
उक्तान्येतानि नामानि ब्रह्मणैव महात्मना॥५॥
हिंदी अर्थ :नौवाँ स्वरूप सिद्धिदात्री है। इस प्रकार देवी के नौ स्वरूपों को नवदुर्गा कहा जाता है। इन नामों का वर्णन स्वयं महात्मा ब्रह्माजी ने किया है।
देवी की शरण और रक्षा
अग्निना दह्यमानस्तु शत्रुमध्ये गतो रणे।
विषमे दुर्गमे चैव भयार्ताः शरणं गताः॥६॥
हिंदी अर्थ: जो व्यक्ति अग्नि से घिरा हो, युद्ध में शत्रुओं के बीच फंस गया हो, कठिन अथवा दुर्गम परिस्थिति में हो और भयभीत होकर देवी की शरण में आए, उसके लिए देवी रक्षा का आश्रय बनती हैं।
न तेषां जायते किञ्चिदशुभं रणसङ्कटे।
नापदं तस्य पश्यामि शोकदुःखभयं न हि॥७॥
हिंदी अर्थ :देवी की शरण लेने वाले भक्त के लिए युद्ध अथवा संकट की परिस्थिति में कोई अमंगल नहीं होता—ऐसा इस स्तोत्र में देवी की कृपा के संदर्भ में कहा गया है। उसे विपत्ति, शोक, दुःख और भय से रक्षा प्राप्त होती है।
यैस्तु भक्त्या स्मृता नूनं तेषां वृद्धिः प्रजायते।
ये त्वां स्मरन्ति देवेशि रक्षसे तान्न संशयः॥८॥
हिंदी अर्थ :जो लोग भक्तिभाव से देवी का स्मरण करते हैं, उनके जीवन में उन्नति और कल्याण की भावना उत्पन्न होती है। हे देवेश्वरी! जो आपका स्मरण करते हैं, आप उनकी रक्षा करती हैं—इसमें कोई संदेह नहीं।
मातृशक्तियों का वर्णन
प्रेतसंस्था तु चामुण्डा वाराही महिषासना।
ऐन्द्री गजसमारूढा वैष्णवी गरुडासना॥९॥
हिंदी अर्थ: चामुंडा देवी प्रेत पर विराजमान हैं। वाराही देवी भैंसे पर, ऐन्द्री हाथी पर और वैष्णवी गरुड़ पर विराजमान हैं।
माहेश्वरी वृषारूढा कौमारी शिखिवाहना।
लक्ष्मीः पद्मासना देवी पद्महस्ता हरिप्रिया॥१०॥
हिंदी अर्थ :माहेश्वरी बैल पर और कौमारी मोर पर विराजमान हैं। भगवान विष्णु की प्रिय लक्ष्मी देवी कमल के आसन पर विराजमान हैं और उनके हाथों में कमल है।
श्वेतरूपधरा देवी ईश्वरी वृषवाहना।
ब्राह्मी हंससमारूढा सर्वाभरणभूषिता॥११॥
हिंदी अर्थ: श्वेत स्वरूप धारण करने वाली ईश्वरी देवी वृषभ पर सवार हैं। ब्राह्मी देवी हंस पर विराजमान हैं और सभी प्रकार के आभूषणों से सुशोभित हैं।
इत्येता मातरः सर्वाः सर्वयोगसमन्विताः।
नानाभरणशोभाढ्या नानारत्नोपशोभिताः॥१२॥
हिंदी अर्थ :ये सभी मातृशक्तियाँ विभिन्न योगशक्तियों से संपन्न हैं। वे अनेक प्रकार के आभूषणों और रत्नों से सुशोभित हैं।
देवी के अस्त्र-शस्त्र
दृश्यन्ते रथमारूढा देव्यः क्रोधसमाकुलाः।
शङ्खं चक्रं गदां शक्तिं हलं च मुसलायुधम्॥१३॥
हिंदी अर्थ :ये देवियाँ रथों पर सवार होकर अपने शक्तिशाली स्वरूप में दिखाई देती हैं। उनके हाथों में शंख, चक्र, गदा, शक्ति, हल और मूसल जैसे अस्त्र हैं।
खेटकं तोमरं चैव परशुं पाशमेव च।
कुन्तायुधं त्रिशूलं च शार्ङ्गमायुधमुत्तमम्॥१४॥
हिंदी अर्थ: वे ढाल, तोमर, फरसा, पाश, कुंत, त्रिशूल और श्रेष्ठ शार्ङ्ग धनुष जैसे अनेक अस्त्र-शस्त्र धारण करती हैं।
दैत्यानां देहनाशाय भक्तानामभयाय च।
धारयन्त्यायुधानीत्थं देवानां च हिताय वै॥१५॥
हिंदी अर्थ :देवी इन अस्त्र-शस्त्रों को दैत्यों के विनाश, भक्तों को निर्भयता प्रदान करने और देवताओं के कल्याण के लिए धारण करती हैं।
देवी से रक्षा की प्रार्थना
नमस्तेऽस्तु महारौद्रे महाघोरपराक्रमे।
महाबले महोत्साहे महाभयविनाशिनि॥१६॥
हिंदी अर्थ :हे अत्यंत रौद्र स्वरूप वाली देवी! हे महान पराक्रम, बल और उत्साह से संपन्न तथा बड़े से बड़े भय का नाश करने वाली माता! आपको नमस्कार है।
त्राहि मां देवि दुष्प्रेक्ष्ये शत्रूणां भयवर्धिनि।
प्राच्यां रक्षतु मामैन्द्री आग्नेय्यामग्निदेवता॥१७॥
हिंदी अर्थ :हे देवी! आपके तेजस्वी स्वरूप को देखना भी कठिन है और आप शत्रुओं के भय को बढ़ाने वाली हैं। मेरी रक्षा करें। पूर्व दिशा में ऐन्द्री और आग्नेय दिशा में अग्निदेवता मेरी रक्षा करें।
दक्षिणेऽवतु वाराही नैऋत्यां खड्गधारिणी।
प्रतीच्यां वारुणी रक्षेद् वायव्यां मृगवाहिनी॥१८॥
हिंदी अर्थ: दक्षिण दिशा में वाराही, नैऋत्य कोण में खड्गधारिणी, पश्चिम दिशा में वारुणी और वायव्य कोण में मृगवाहिनी देवी मेरी रक्षा करें।
उदीच्यां पातु कौमारी ऐशान्यां शूलधारिणी।
ऊर्ध्वं ब्रह्माणि मे रक्षेदधस्ताद्वैष्णवी तथा॥१९॥
हिंदी अर्थ:उत्तर दिशा में कौमारी और ईशान कोण में शूलधारिणी देवी मेरी रक्षा करें। ऊपर की ओर ब्रह्माणी और नीचे की ओर वैष्णवी मेरी रक्षा करें।
एवं दश दिशो रक्षेच्चामुण्डा शववाहना।
जया मे चाग्रतः पातु विजया पातु पृष्ठतः॥२०॥
हिंदी अर्थ :शव को वाहन बनाने वाली चामुंडा देवी दसों दिशाओं से मेरी रक्षा करें। जया मेरे आगे और विजया मेरे पीछे से रक्षा करें।
शरीर के विभिन्न अंगों की रक्षा
अजिता वामपार्श्वे तु दक्षिणे चापराजिता।
शिखामुद्योतिनी रक्षेदुमा मूर्ध्नि व्यवस्थिता॥२१॥
हिंदी अर्थ :अजिता देवी बाईं ओर और अपराजिता दाईं ओर मेरी रक्षा करें। उद्योतिनी मेरी शिखा तथा उमा मेरे मस्तक की रक्षा करें।
मालाधरी ललाटे च भ्रुवौ रक्षेद्यशस्विनी।
त्रिनेत्रा च भ्रुवोर्मध्ये यमघण्टा च नासिके॥२२॥
हिंदी अर्थ: मालाधरी मेरे ललाट की, यशस्विनी दोनों भौहों की, त्रिनेत्रा भौहों के मध्य भाग की और यमघण्टा मेरी नासिका की रक्षा करें।
शङ्खिनी चक्षुषोर्मध्ये श्रोत्रयोर्द्वारवासिनी।
कपोलौ कालिका रक्षेत्कर्णमूले तु शाङ्करी॥२३॥
हिंदी अर्थ: शंखिनी नेत्रों की, द्वारवासिनी दोनों कानों की, कालिका गालों की और शांकरी कानों के मूल भाग की रक्षा करें।
नासिकायां सुगन्धा च उत्तरोष्ठे च चर्चिका।
अधरे चामृतकला जिह्वायां च सरस्वती॥२४॥
हिंदी अर्थ : सुगंधा देवी नासिका की, चर्चिका ऊपरी होंठ की, अमृतकला निचले होंठ की और सरस्वती देवी जीभ की रक्षा करें।
दन्तान् रक्षतु कौमारी कण्ठदेशे तु चण्डिका।
घण्टिकां चित्रघण्टा च महामाया च तालुके॥२५॥
हिंदी अर्थ :कौमारी दाँतों की, चंडिका कंठ की, चित्रघंटा गले के भीतर के भाग की और महामाया तालु की रक्षा करें।
कामाक्षी चिबुकं रक्षेद् वाचं सर्वमङ्गला।
ग्रीवायां भद्रकाली च पृष्ठवंशे धनुर्धरी॥२६॥
हिंदी अर्थ: कामाक्षी ठोड़ी की और सर्वमंगला वाणी की रक्षा करें। भद्रकाली गर्दन की तथा धनुर्धरी रीढ़ की रक्षा करें।
नीलग्रीवा बहिःकण्ठे नलिकां नलकूबरी।
स्कन्धयोः खड्गिनी रक्षेद् बाहू रक्षेद् वज्रधारिणी॥२७॥
हिंदी अर्थ :नीलग्रीवा कंठ के बाहरी भाग की, नलकूबरी गले की नली की, खड्गिनी कंधों की और वज्रधारिणी दोनों भुजाओं की रक्षा करें।
हस्तयोर्दण्डिनी रक्षेदम्बिका चाङ्गुलीषु च।
नखाञ्छूलेश्वरी रक्षेत्कुक्षौ रक्षेत्कुलेश्वरी॥२८॥
हिंदी अर्थ :दंडिनी दोनों हाथों की, अंबिका उंगलियों की, शूलेश्वरी नाखूनों की और कुलेश्वरी पेट के भाग की रक्षा करें।
स्तनौ रक्षेन्महादेवी मनः शोकविनाशिनी।
हृदये ललिता देवी उदरे शूलधारिणी॥२९॥
हिंदी अर्थ :महादेवी शरीर के वक्षस्थल की, शोकविनाशिनी मन की, ललिता हृदय की और शूलधारिणी उदर की रक्षा करें।
नाभौ च कामिनी रक्षेद् गुह्यं गुह्येश्वरी तथा।
पूतना कामिका मेढ्रं गुदे महिषवाहिनी॥३०॥
हिंदी अर्थ :कामिनी नाभि की और गुह्येश्वरी गुप्त अंगों की रक्षा करें। पूतना और कामिका जननेंद्रिय तथा महिषवाहिनी गुदा की रक्षा करें।
कट्यां भगवती रक्षेज्जानुनी विन्ध्यवासिनी।
जङ्घे महाबला रक्षेत्सर्वकामप्रदायिनी॥३१॥
हिंदी अर्थ:भगवती कमर की, विंध्यवासिनी घुटनों की और महाबला दोनों जंघाओं की रक्षा करें।
गुल्फयोर्नारसिंही च पादपृष्ठे तु तैजसी।
पादाङ्गुलीषु श्री रक्षेत्पादाधस्तलवासिनी॥३२॥
हिंदी अर्थ: नारसिंही दोनों टखनों की, तैजसी पैरों के पिछले भाग की, श्री देवी पैर की उंगलियों की और तलवासिनी पैरों के तलवों की रक्षा करें।
शरीर के आंतरिक तत्वों की रक्षा
नखान् दंष्ट्राकराली च केशांश्चैवोर्ध्वकेशिनी।
रोमकूपेषु कौबेरी त्वचं वागीश्वरी तथा॥३३॥
हिंदी अर्थ: दंष्ट्राकराली नाखूनों की, ऊर्ध्वकेशिनी बालों की, कौबेरी रोमछिद्रों की और वागीश्वरी त्वचा की रक्षा करें।
रक्तमज्जावसामांसान्यस्थिमेदांसि पार्वती।
अन्त्राणि कालरात्रिर्श्च पित्तं च मुकुटेश्वरी॥३४॥
हिंदी अर्थ :पार्वती देवी रक्त, मज्जा, वसा, मांस, अस्थि और मेद की रक्षा करें। कालरात्रि आंतों की तथा मुकुटेश्वरी पित्त की रक्षा करें।
पद्मावती पद्मकोशे कफे चूडामणिस्तथा।
ज्वालामुखी नखज्वालामभेद्या सर्वसन्धिषु॥३५॥
हिंदी अर्थ :पद्मावती पद्मकोश की, चूडामणि कफ की, ज्वालामुखी नखों के तेज की और अभेद्या शरीर के सभी जोड़ों की रक्षा करें।
शुक्रं ब्रह्माणि मे रक्षेच्छायां छत्रेश्वरी तथा।
अहङ्कारं मनो बुद्धिं रक्षेन्मे धर्मचारिणी॥३६॥
हिंदी अर्थ :ब्रह्माणी शुक्र की और छत्रेश्वरी छाया की रक्षा करें। धर्मचारिणी मेरे अहंकार, मन और बुद्धि की रक्षा करें।
प्राणापानौ तथा व्यानमुदानं च समानकम्।
वज्रहस्ता च मे रक्षेत्प्राणं कल्याणशोभना॥३७॥
हिंदी अर्थ :वज्रहस्ता और कल्याणशोभना देवी मेरे प्राण, अपान, व्यान, उदान और समान—इन पंचप्राणों की रक्षा करें।
रसे रूपे च गन्धे च शब्दे स्पर्शे च योगिनी।
सत्त्वं रजस्तमश्चैव रक्षेन्नारायणी सदा॥३८॥
हिंदी अर्थ: योगिनी देवी रस, रूप, गंध, शब्द और स्पर्श—इन पांच विषयों की रक्षा करें। नारायणी देवी सदा मेरे सत्त्व, रज और तम तीनों गुणों की रक्षा करें।
आयु, धर्म, यश, धन और परिवार की रक्षा
आयु रक्षतु वाराही धर्मं रक्षतु वैष्णवी।
यशः कीर्तिं च लक्ष्मीं च धनं विद्यां च चक्रिणी॥३९॥
हिंदी अर्थ: वाराही मेरी आयु की और वैष्णवी मेरे धर्म की रक्षा करें। चक्रिणी मेरे यश, कीर्ति, लक्ष्मी, धन और विद्या की रक्षा करें।
गोत्रमिन्द्राणि मे रक्षेत्पशून्मे रक्ष चण्डिके।
पुत्रान् रक्षेन्महालक्ष्मीर्भार्यां रक्षतु भैरवी॥४०॥
हिंदी अर्थ: इंद्राणी मेरे कुल और गोत्र की रक्षा करें। हे चंडिके! मेरे पशुओं की रक्षा करें। महालक्ष्मी मेरी संतान की और भैरवी मेरी पत्नी की रक्षा करें।
पन्थानं सुपथा रक्षेन्मार्गं क्षेमकरी तथा।
राजद्वारे महालक्ष्मीर्विजया सर्वतः स्थिता॥४१॥
हिंदी अर्थ : सुपथा देवी मेरे मार्ग की और क्षेमकरी मेरी यात्रा की रक्षा करें। राजद्वार अर्थात महत्वपूर्ण कार्यों और स्थानों पर महालक्ष्मी रक्षा करें तथा विजया चारों ओर से मेरा संरक्षण करें।
छूटे हुए स्थानों की रक्षा
रक्षाहीनं तु यत्स्थानं वर्जितं कवचेन तु।
तत्सर्वं रक्ष मे देवि जयन्ती पापनाशिनी॥४२॥
हिंदी अर्थ: हे पापनाशिनी जयन्ती देवी! शरीर अथवा जीवन का जो भी स्थान इस कवच में रक्षा से छूट गया हो, उसकी भी आप रक्षा करें।
कवच के प्रभाव का वर्णन
पदमेकं न गच्छेत्तु यदीच्छेच्छुभमात्मनः।
कवचेनावृतो नित्यं यत्र यत्रैव गच्छति॥४३॥
हिंदी अर्थ:जो व्यक्ति अपने कल्याण की इच्छा रखता है, उसे इस कवच की शरण में रहकर आगे बढ़ने की भावना रखनी चाहिए। जहाँ भी वह जाता है, देवी के संरक्षण का स्मरण उसके साथ रहता है।
तत्र तत्रार्थलाभश्च विजयः सार्वकामिकः।
यं यं चिन्तयते कामं तं तं प्राप्नोति निश्चितम्॥४४॥
हिंदी अर्थ: परंपरागत फलश्रुति के अनुसार कवच से आवृत भक्त को अपने कार्यों में लाभ और विजय प्राप्त होती है तथा उसकी शुभ इच्छाओं की पूर्ति होती है।
परमैश्वर्यमतुलं प्राप्स्यते भूतले पुमान्।
निर्भयो जायते मर्त्यः सङ्ग्रामेष्वपराजितः॥४५॥
हिंदी अर्थ: कवच की महिमा के अनुसार भक्त पृथ्वी पर श्रेष्ठ ऐश्वर्य प्राप्त करता है, निर्भय होता है और संघर्षों में विजय प्राप्त करने वाला बनता है।
त्रैलोक्ये तु भवेत्पूज्यः कवचेनावृतः पुमान्।
इदं तु देव्याः कवचं देवानामपि दुर्लभम्॥४६॥
हिंदी अर्थ: कवच से सुरक्षित भक्त तीनों लोकों में सम्मान योग्य बताया गया है। यह देवी कवच देवताओं के लिए भी दुर्लभ माना गया है।
यः पठेत्प्रयतो नित्यं त्रिसन्ध्यं श्रद्धयान्वितः।
दैवी कला भवेत्तस्य त्रैलोक्येष्वपराजितः॥४७॥
हिंदी अर्थ: जो व्यक्ति शुद्ध भाव और श्रद्धा से प्रतिदिन तीनों संध्याओं में इसका पाठ करता है, उसमें देवी की कृपा और शक्ति का संचार होने तथा जीवन के संघर्षों में दृढ़ बने रहने की फलश्रुति बताई गई है।
जीवेद्वर्षशतं साग्रमपमृत्युविवर्जितः।
नश्यन्ति व्याधयः सर्वे लूताविस्फोटकादयः॥४८॥
हिंदी अर्थ: परंपरागत फलश्रुति में दीर्घायु तथा रोगों से रक्षा का वर्णन किया गया है। इन कथनों को धार्मिक आस्था और स्तोत्र की पारंपरिक फलश्रुति के रूप में समझना चाहिए।
स्थावरं जङ्गमं चैव कृत्रिमं चापि यद्विषम्।
अभिचाराणि सर्वाणि मन्त्रयन्त्राणि भूतले॥४९॥
हिंदी अर्थ:इस श्लोक में विभिन्न प्रकार के विष तथा नकारात्मक तांत्रिक प्रभावों से रक्षा की पारंपरिक मान्यता का वर्णन किया गया है।
भूचराः खेचराश्चैव जलजाश्चौपदेशिकाः।
सहजा कुलजा माला डाकिनी शाकिनी तथा॥५०॥
हिंदी अर्थ: भूमि, आकाश और जल से संबंधित विभिन्न प्रकार की नकारात्मक शक्तियों तथा डाकिनी-शाकिनी आदि का उल्लेख करते हुए देवी के कवच से सुरक्षा की प्रार्थना की गई है।
अन्तरिक्षचरा घोरा डाकिन्यश्च महाबलाः।
ग्रहभूतपिशाचाश्च यक्षगन्धर्वराक्षसाः॥५१॥
हिंदी अर्थ: अंतरिक्ष में विचरण करने वाली शक्तियों, डाकिनियों, ग्रहों, भूत-पिशाचों, यक्षों, गंधर्वों और राक्षसों आदि से रक्षा की पारंपरिक भावना व्यक्त की गई है।
ब्रह्मराक्षसवेतालाः कूष्माण्डा भैरवादयः।
नश्यन्ति दर्शनात्तस्य कवचे हृदि संस्थिते॥५२॥
हिंदी अर्थ: ब्रह्मराक्षस, वेताल, कूष्मांड और भैरव आदि विभिन्न नकारात्मक शक्तियों का उल्लेख किया गया है। कवच को हृदय में धारण करने वाले भक्त के लिए इनसे भय न रहने की धार्मिक मान्यता व्यक्त की गई है।
मानोन्नतिर्भवेद्राज्ञस्तेजोवृद्धिकरं परम्।
यशसा वर्द्धते सोऽपि कीर्तिमण्डितभूतले॥५३॥
हिंदी अर्थ :कवच के प्रभाव से सम्मान, तेज, यश और कीर्ति में वृद्धि होने की फलश्रुति कही गई है।
दुर्गा सप्तशती पाठ से पहले देवी कवच
जपेत्सप्तशतीं चण्डीं कृत्वा तु कवचं पुरा।
यावद्भूमण्डलं धत्ते सशैलवनकाननम्॥५४॥
हिंदी अर्थ: फलश्रुति में कहा गया है कि चंडी अर्थात दुर्गा सप्तशती का पाठ करने से पहले देवी कवच का पाठ करना चाहिए। पृथ्वी के पर्वतों और वनों सहित स्थिर रहने तक इसकी महिमा का वर्णन किया गया है।
तावत्तिष्ठति मेदिन्यां सन्ततिः पुत्रपौत्रिकी।
देहान्ते परमं स्थानं यत्सुरैरपि दुर्लभम्॥५५॥
हिंदी अर्थ: इसकी फलश्रुति में भक्त के परिवार और संतति की समृद्धि तथा देहांत के बाद दुर्लभ परम स्थान की प्राप्ति का वर्णन किया गया है।
प्राप्नोति पुरुषो नित्यं महामायाप्रसादतः।
लभते परमं रूपं शिवेन सह मोदते॥५६॥
हिंदी अर्थ: महामाया की कृपा से भक्त परम स्थान प्राप्त करता है और अंततः भगवान शिव के साथ आनंद प्राप्त करता है—ऐसी इस कवच की पारंपरिक फलश्रुति है।
॥ इति देव्याः कवचं सम्पूर्णम् ॥
देवी कवच की मुख्य विशेषताएँ
देवी कवच को समझने के लिए इसके प्रमुख भागों को इस प्रकार देखा जा सकता है:
1. नवदुर्गा का स्मरण
शैलपुत्री से सिद्धिदात्री तक नौ देवी स्वरूपों का स्मरण किया गया है।
2. मातृशक्तियों का आवाहन
चामुंडा, वाराही, ऐन्द्री, वैष्णवी, माहेश्वरी, कौमारी, लक्ष्मी, ईश्वरी और ब्राह्मी आदि शक्तियों का वर्णन है।
3. दसों दिशाओं की रक्षा
पूर्व से लेकर ईशान, ऊपर और नीचे तक सभी दिशाओं में देवी की रक्षा की प्रार्थना की गई है।
4. शरीर के प्रत्येक अंग की रक्षा
मस्तक से लेकर पैर के तलवों तक शरीर के विभिन्न अंगों के लिए देवी के अलग-अलग स्वरूपों का स्मरण किया गया है।
5. मन और बुद्धि की रक्षा
कवच में केवल शरीर ही नहीं बल्कि मन, बुद्धि और अहंकार की रक्षा के लिए भी देवी से प्रार्थना की गई है।
6. पंचप्राणों की रक्षा
प्राण, अपान, व्यान, उदान और समान की रक्षा का भी उल्लेख मिलता है।
देवी कवच का पाठ कब करें?
देवी कवच का पाठ भक्त अपनी श्रद्धा और पारंपरिक नियमों के अनुसार कर सकते हैं। विशेष अवसरों में:
नवरात्रि
दुर्गाष्टमी
महानवमी
शुक्रवार
देवी मंदिर में पूजा
दुर्गा सप्तशती पाठ
चंडी पाठ
विशेष देवी अनुष्ठान
के समय इसका पाठ किया जाता है।
नवरात्रि में देवी कवच का पाठ विशेष रूप से लोकप्रिय है।
देवी कवच पाठ विधि
1. स्नान और शुद्धता
सुबह स्नान करके स्वच्छ वस्त्र धारण करें। पूजा स्थान को साफ रखें।
2. देवी की स्थापना
माँ दुर्गा, चंडी या अपने इष्ट देवी के चित्र अथवा विग्रह के सामने दीपक जलाएं।
3. संकल्प
अपने मन में देवी से सुरक्षा, सद्बुद्धि, आत्मबल, परिवार के कल्याण और आध्यात्मिक उन्नति की प्रार्थना करें।
4. देवी का ध्यान
कुछ क्षण शांत होकर माँ भगवती के स्वरूप का ध्यान करें।
5. देवी कवच का पाठ
पहले विनियोग और फिर देवी कवच का श्रद्धापूर्वक पाठ करें।
6. दुर्गा सप्तशती का पाठ
यदि आप संपूर्ण दुर्गा सप्तशती पाठ कर रहे हैं तो अपनी परंपरा में निर्धारित क्रम का पालन करें।
7. समापन
अंत में माँ दुर्गा की आरती और प्रार्थना करें।
क्या देवी कवच रोज पढ़ सकते हैं?
हाँ। सामान्य भक्तिपूर्ण पाठ को श्रद्धा के अनुसार प्रतिदिन किया जा सकता है। विशेष अनुष्ठान के लिए पाठ की संख्या और नियम अपनी गुरु-परंपरा या आचार्य के निर्देश के अनुसार रखना उचित है।
क्या नवरात्रि में देवी कवच पढ़ना चाहिए?
नवरात्रि देवी उपासना का विशेष समय माना जाता है। इस दौरान देवी कवच, अर्गला स्तोत्र, कीलक तथा दुर्गा सप्तशती के पाठ की परंपरा कई साधकों में प्रचलित है।
देवी कवच के क्या लाभ हैं?
धार्मिक मान्यता के अनुसार देवी कवच का पाठ भय से मुक्ति, आध्यात्मिक सुरक्षा, आत्मबल, साहस, परिवार के कल्याण और देवी की कृपा की भावना के लिए किया जाता है।
क्या देवी कवच दुर्गा सप्तशती का हिस्सा है?
देवी कवच दुर्गा सप्तशती/देवी माहात्म्य की पाठ-परंपरा से जुड़ा एक महत्वपूर्ण स्तोत्र है। इसे सप्तशती के मुख्य 700 श्लोकों से अलग, पाठ के सहायक अंग के रूप में परंपरागत रूप से पढ़ा जाता है।
देवी कवच के बाद कौन सा पाठ करें?
संपूर्ण चंडी/दुर्गा सप्तशती पाठ की परंपरा में देवी कवच के बाद अर्गला स्तोत्र और कीलक स्तोत्र का पाठ किया जाता है। अलग-अलग परंपराओं में क्रम में कुछ अंतर हो सकता है।
क्या देवी कवच महिलाओं द्वारा पढ़ा जा सकता है?
सामान्य भक्तिपूर्ण स्तोत्र-पाठ के संबंध में अपनी पारिवारिक एवं धार्मिक परंपरा का पालन करना उचित है। विशेष अनुष्ठान के लिए गुरु या आचार्य द्वारा बताए गए नियमों का पालन करें।
क्या देवी कवच रात में पढ़ सकते हैं?
हाँ, सामान्य पाठ अपनी सुविधा और परंपरा के अनुसार किया जा सकता है। देवी साधना में प्रातःकाल और संध्या का समय भी सामान्यतः उपयुक्त माना जाता है।
क्या देवी कवच शत्रु बाधा के लिए पढ़ा जाता है?
परंपरागत रूप से देवी कवच को संकट और विरोधी परिस्थितियों में देवी की रक्षा की प्रार्थना से जोड़ा जाता है। इसका पाठ किसी के अहित की भावना के बजाय देवी की शरण, साहस और सद्बुद्धि के भाव से करना उचित है।
देवी कवच और चंडी कवच में अंतर
देवी कवच, दुर्गा कवच और चंडी कवच नाम कई जगह एक ही स्तोत्र के लिए उपयोग किए जाते हैं। दुर्गा सप्तशती की पाठ-परंपरा में इसे श्री देव्याः कवचम् के नाम से जाना जाता है।
हालाँकि अन्य देवी-परंपराओं में “चंडी कवच” नाम से अलग पाठ भी मिल सकते हैं। इसलिए वेबसाइट पर प्रकाशित करते समय शीर्षक में “देवी कवच (दुर्गा सप्तशती)” लिखना पाठक के लिए अधिक स्पष्ट रहेगा।
देवी कवच (दुर्गा सप्तशती) माँ भगवती के अनेक स्वरूपों का स्मरण कराने वाला महत्वपूर्ण स्तोत्र है। इसमें नवदुर्गा, मातृशक्तियों और देवी के विभिन्न रूपों से शरीर, दिशाओं, मन, प्राण, परिवार और जीवन के विभिन्न क्षेत्रों की रक्षा की प्रार्थना की गई है।
नवरात्रि, दुर्गा पूजा अथवा नियमित देवी साधना में श्रद्धा और शुद्ध भाव से इसका पाठ किया जा सकता है।
॥ जय माता दी ॥
॥ ॐ नमश्चण्डिकायै ॥