29 Jan 2026 Spiritual Guidance Trusted Information

गुलिक काल क्या है? - गुलिक काल का महत्व, गणना और उपयोग

गुलिक काल हिंदू पंचांग के अनुसार दिन का एक ऐसा समय होता है, जिसे किसी नए कार्य, यात्रा या शुभ कार्य की शुरुआत के लिए अशुभ माना जाता है। यह काल शनि ग्रह से संबंधित होता है और इसके दौरान आरंभ किए गए कार्यों में विलंब या रुकावटें आने की संभावना रहती है।

गुलिक काल का अर्थ

‘गुलिक’ को शनि ग्रह का पुत्र माना गया है। इसलिए गुलिक काल को शनि का प्रभाव क्षेत्र भी कहा जाता है। इस समय में किए गए कार्य लंबे समय तक चलते हैं, लेकिन इनकी पूर्णता में विलंब हो सकता है। इसलिए सामान्यत: शुभ कार्य, विवाह, यात्रा, या व्यापार आरंभ से बचने की सलाह दी जाती है।

गुलिक काल की गणना विधि

दिन के 12 हिस्से किए जाते हैं। प्रत्येक हिस्से का स्वामी एक ग्रह होता है — सूर्य, चंद्र, मंगल, बुध, गुरु, शुक्र और शनि। दिन के अनुसार गुलिक काल अलग-अलग होता है।
वार (दिन) गुलिक काल
सोमवार07:30 AM – 09:00 AM
मंगलवार15:00 PM – 16:30 PM
बुधवार12:00 PM – 13:30 PM
गुरुवार13:30 PM – 15:00 PM
शुक्रवार10:30 AM – 12:00 PM
शनिवार09:00 AM – 10:30 AM
रविवार06:00 AM – 07:30 AM
ऊपर दिए समय औसत सूर्योदय 6:00 AM के अनुसार है।

गुलिक काल का महत्व

  • यह समय शनि ग्रह के प्रभाव में होता है, इसलिए कार्यों में रुकावट या देरी हो सकती है।
  • शुभ कार्य जैसे विवाह, गृह प्रवेश, मुहूर्त या यात्रा के लिए इसे टाला जाता है।
  • हालांकि, पैतृक कार्य, शनि पूजा या साधना के लिए यह काल शुभ माना जाता है।

गुलिक काल और राहु काल में अंतर

बहुत लोग गुलिक काल और राहु काल को समान समझ लेते हैं, लेकिन दोनों अलग हैं। राहु काल में कार्य करने से परिणाम नकारात्मक मिल सकते हैं, जबकि गुलिक काल में कार्य तो सफल होता है, परंतु विलंब और संघर्ष के साथ।

गुलिक काल से बचने के उपाय

  1. शुभ कार्य गुलिक काल के बाहर करें।
  2. अगर अनिवार्य हो, तो पहले गणेश और शनिदेव की पूजा करें।
  3. “ॐ शं शनैश्चराय नमः” मंत्र का 108 बार जप करने से इसके प्रभाव को कम किया जा सकता है।
गुलिक काल एक महत्वपूर्ण ज्योतिषीय समय है जो शनि ग्रह के प्रभाव को दर्शाता है। यह काल व्यक्ति को सावधानीपूर्वक कार्य करने की प्रेरणा देता है। यदि आप अपने दैनिक कार्य शुभ समय में करना चाहते हैं, तो गुलिक काल, राहु काल और अभिजीत मुहूर्त का ध्यान अवश्य रखें।

॥ जय शनिदेव ॥

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