29 Jan 2026 Spiritual Guidance Trusted Information

महाशिवरात्रि कथा: समुद्र मंथन | शिव का नीलकंठ स्वरूप

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महाशिवरात्रि का पर्व शिव भक्तों के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है। इस दिन भगवान शिव की पूजा और व्रत रखने से उनकी कृपा प्राप्त होती है। महाशिवरात्रि की कथा में समुद्र मंथन की घटना का विशेष उल्लेख मिलता है। पौराणिक कथाओं के अनुसार, देवताओं और असुरों के बीच अमृत प्राप्त करने के लिए समुद्र मंथन का आयोजन हुआ। मंथन के दौरान कई बहुमूल्य वस्तुएं निकलीं, लेकिन जब विष (हलाहल) समुद्र से निकला, तो यह अत्यंत घातक और विनाशकारी था। विष के प्रभाव से पूरे संसार में संकट उत्पन्न हो गया। सभी देवता और असुर इस विष के प्रकोप से भयभीत हो गए और समाधान के लिए भगवान शिव के पास पहुंचे। शिव ने संसार की रक्षा के लिए विष को अपने कंठ में धारण कर लिया। उन्होंने इसे अपने गले में रोका, जिससे उनका गला नीला हो गया और वे "नीलकंठ" कहलाए। भगवान शिव के इस त्याग और संसार को बचाने के उनके इस महान कार्य के लिए महाशिवरात्रि पर्व मनाया जाता है। इस दिन भक्त शिवलिंग पर जल, दूध, बेलपत्र आदि चढ़ाकर भगवान शिव को प्रसन्न करने का प्रयास करते हैं। समुद्र मंथन की इस कथा से हमें यह शिक्षा मिलती है कि अपने स्वार्थ से ऊपर उठकर दूसरों की भलाई के लिए त्याग और बलिदान करना एक महान गुण है। यही शिव का सच्चा संदेश है।
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