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कालभैरव चालीसा – पाठ, महत्व, विधि, लाभ और कालभैरव मंत्र

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 कालभैरव चालीसा – पाठ, महत्व, विधि, लाभ और कालभैरव मंत्र

कालभैरव चालीसा भगवान शिव के उग्र स्वरूप माने जाने वाले कालभैरव की आराधना के लिए पढ़ी जाती है। धार्मिक मान्यता के अनुसार भगवान कालभैरव भय और नकारात्मकता का नाश करने वाले तथा काशी के रक्षक हैं। भक्त उनकी उपासना सुख-शांति, साहस और सुरक्षा की कामना से करते हैं।

कालभैरव चालीसा का महत्व

कालभैरव चालीसा में भगवान कालभैरव की महिमा और शक्ति का वर्णन किया गया है। श्रद्धापूर्वक इसका पाठ करने से मन में आत्मविश्वास और आध्यात्मिक शक्ति बढ़ने की भावना होती है। यह साधक को भय से मुक्त होकर धर्म और सत्य के मार्ग पर चलने की प्रेरणा देता है।

कालभैरव चालीसा कब पढ़ें?

कालभैरव की पूजा के लिए कालाष्टमी विशेष मानी जाती है। इसके अलावा मंगलवार और रविवार को भी चालीसा का पाठ किया जा सकता है। सुबह स्नान के बाद या शाम को दीपक जलाकर शांत मन से पाठ करना उचित माना जाता है।

कालभैरव चालीसा पाठ विधि

  1. स्नान करके स्वच्छ वस्त्र धारण करें।
  2. पूजा स्थान पर भगवान कालभैरव की तस्वीर या प्रतिमा रखें।
  3. दीपक और धूप जलाकर पुष्प अर्पित करें।
  4. ॐ कालभैरवाय नमः॥ मंत्र का जाप करें।
  5. श्रद्धा से कालभैरव चालीसा का पाठ करें।
  6. अंत में भगवान से सुख, शांति और सुरक्षा की प्रार्थना करें।

कालभैरव का सरल मंत्र

ॐ कालभैरवाय नमः॥

इस मंत्र का जाप चालीसा पाठ से पहले या बाद में किया जा सकता है।

कालभैरव चालीसा पाठ के लाभ

धार्मिक मान्यताओं के अनुसार कालभैरव चालीसा के पाठ से—

  • भय और नकारात्मकता से मुक्ति की कामना की जाती है।
  • साहस और आत्मविश्वास बढ़ाने की प्रेरणा मिलती है।
  • जीवन की बाधाओं से उबरने के लिए मानसिक शक्ति मिलती है।
  • आध्यात्मिक शांति और भक्ति की भावना बढ़ती है।
  • भगवान कालभैरव की कृपा और सुरक्षा का स्मरण होता है।

कालभैरव चालीसा

यहाँ श्री काल भैरव चालीसा का पूरा पाठ हिंदी में प्रस्तुत है। इस चालीसा का पाठ भगवान काल भैरव की कृपा प्राप्त करने और सभी प्रकार के भय, कष्ट तथा बाधाओं से मुक्ति के लिए किया जाता है।

दोहा 

श्री गणपति गुरु पद कमल, गहि नावौं शिर आय। 
कालभैरव चालीसा, गावत अति सुख पाय॥ 

जय जय श्री काली के लाला।
जय जय जय काशी के पाला॥

चौपाई 

जय जय भैरव देव दयाला।
सदा करत सन्तन प्रतिपाला॥ 

भैरव रूप धरयो शिव देवा।
नारद मुनि मोहि पाए सेवा॥

तुम ही हो त्रिशूल विशेषा।
भय हरण भुजदण्ड शेषा॥

कर में खप्पर खड्ग विराजे।
सब संकट कटि दूर पराजे॥

शीश जटा लपटावन सोहै।
मस्तक चन्द मुकुट मन मोहे॥

गल मुण्डन की माला सोहै।
देवन देखा भाव विभोहे॥

काशी क्षेत्र विराजत स्वामी।
दंडपाणि तुम अंतरयामी॥

विश्वनाथ की आज्ञा मानी।
काशी की रक्षा निज जानी॥

जय जय कालभैरव अवतारी।
संकट हरण मङ्गलकारी॥

जो मन वचन कर्म से ध्यावै।
सो प्राणी सब सुख फल पावै॥

भूत पिशाच निकट नहिं आवै।
भैरव नाम सुने डर पावै॥

ग्रह नक्षत्र सब शांत करावै।
जो तुमको नित ध्यान लगावै॥

दुष्ट दलन अरि क्षय करदाता।
जन कल्याण सदा सुखदाता॥

धूप दीप जो तुमको लावै।
सो जन परम सिद्धि को पावै॥

अष्ट सिद्धि नवनिधि के दाता।
भैरव देव शरण सुखदाता॥

भक्ति भाव से जो गुन गावै।
सो निश्चय वांछित फल पावै॥

जय भैरव जय जय जग स्वामी।
कृपा करो प्रभु अंतरयामी॥

दोहा 

भैरव चालीसा पड़े, जो शत बार सुजान।
पावै सुख संपत्ति अमित, होवे अति कल्याण॥

कालभैरव की कृपा, सदा रहे तिहि पास।
संकट मोचन होइ सब, पूरै मन की आस॥


 नोट: विभिन्न स्रोतों में पाठ में हल्के अंतर हो सकते हैं। यहाँ प्रमुख एवं प्रचलित संस्करण प्रस्तुत किया गया है।

कालभैरव और काशी

भगवान कालभैरव का काशी से विशेष संबंध माना जाता है। वाराणसी स्थित कालभैरव मंदिर प्रमुख धार्मिक स्थलों में से एक है। मान्यता है कि कालभैरव काशी के रक्षक हैं, इसलिए काशी यात्रा में उनके दर्शन को विशेष महत्व दिया जाता है।

कालाष्टमी पर कालभैरव पूजा

कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को कालाष्टमी कहा जाता है। इस दिन भक्त व्रत, पूजा, मंत्र जाप और कालभैरव चालीसा का पाठ करते हैं। कालाष्टमी की तिथि और पूजा का समय हर स्थान पर अलग हो सकता है, इसलिए स्थानीय पंचांग देखना उचित है।

कालभैरव चालीसा भगवान कालभैरव की भक्ति का सरल माध्यम है। श्रद्धा और नियमितता के साथ इसका पाठ करने से भक्त साहस, शांति और सुरक्षा की कामना करते हैं। कालाष्टमी, रविवार या मंगलवार को कालभैरव पूजा और चालीसा पाठ करना विशेष रूप से लोकप्रिय है।