किस्तुघ्न करण हिन्दू पंचांग में 11 करणों में से एक है। यह एक स्थिर और विशेष प्रकार का करण है, जो केवल अमावस्या तिथि के अंतिम चरण में ही आता है।
किस्तुघ्न करण के विशेष गुण
समाप्ति करण
किस्तुघ्न का शाब्दिक अर्थ है "कष्ट का अंत करने वाला"। यह करण अमावस्या के अंत में होता है, जो नकारात्मक ऊर्जा को समाप्त करने और शांति लाने का संकेत देता है।
धार्मिक महत्व
किस्तुघ्न करण का उपयोग विशेषत: आध्यात्मिक साधना, पितृ तर्पण और नकारात्मकता को समाप्त करने के कार्यों के लिए किया जाता है।
कार्य और शुभता
यह करण शुभ नहीं माना जाता। इसमें शुभ कार्य जैसे विवाह, गृह प्रवेश, या नए कार्यों की शुरुआत से बचना चाहिए हालांकि, इस समय नकारात्मक ऊर्जा को हटाने और साधना के लिए उपयुक्त माना जाता है।
सम्बंधित तिथि
किस्तुघ्न करण केवल अमावस्या तिथि में ही प्रकट होता है। यह चंद्रमा के उदय और अस्त के समय पर निर्भर करता है।
किस्तुघ्न करण का प्रभाव
इस करण में किए गए कार्यों का दीर्घकालिक परिणाम हो सकता है। यह ध्यान और योग जैसे आत्मिक कार्यों के लिए उपयुक्त है। इस समय पवित्र नदी में स्नान, दान और पितरों का स्मरण करना शुभ माना जाता है।
किस्तुघ्न करण पंचांग का एक विशेष हिस्सा है, जिसका महत्व आध्यात्मिक और नकारात्मक ऊर्जा के शमन में अधिक है। इसे समझना और इसका उपयोग उचित प्रकार से करना आवश्यक है।