हिंदू धर्म में श्राद्ध पक्ष (पितृपक्ष) का विशेष महत्व है। पितरों की आत्मा की शांति और मोक्ष के लिए किए जाने वाले इस कर्मकांड में प्रत्येक तिथि का अपना महत्व होता है। पूर्णिमा तिथि को किया गया श्राद्ध पूर्णिमा श्राद्ध कहलाता है। यह श्राद्ध उन पितरों के लिए किया जाता है जिनका निधन पूर्णिमा तिथि को हुआ हो। मान्यता है कि इस दिन विधि-विधान से पितरों का तर्पण करने से वे तृप्त होकर आशीर्वाद देते हैं और घर-परिवार में सुख-समृद्धि बनी रहती है।पूर्णिमा श्राद्ध की विधि
- प्रातः स्नान कर शुद्ध वस्त्र धारण करें।
- पितरों को स्मरण कर संकल्प लें।
- पवित्र स्थान पर काला तिल, जल और कुशा से तर्पण करें।
- पिंडदान में तिल, जौ, चावल और घी का प्रयोग करें।
- ब्राह्मण या योग्य पंडित को भोजन और दान दें।
- गौ, कुत्ते, कौवे और चींटियों को भोजन कराना भी पुण्यदायक माना जाता है।
पूर्णिमा श्राद्ध का फल
- पितरों की आत्मा को तृप्ति और शांति मिलती है।
- व्यक्ति के जीवन में नकारात्मक ऊर्जा और पितृदोष कम होते हैं।
- घर में सुख-शांति और समृद्धि बनी रहती है।
- पितरों के आशीर्वाद से संतान, धन और आरोग्य की प्राप्ति होती है।
विशेष मान्यता
यदि किसी व्यक्ति को अपने पितरों की मृत्यु तिथि ज्ञात न हो, तो वह पितृपक्ष की अमावस्या या पूर्णिमा तिथि पर श्राद्ध करके पितरों को संतुष्ट कर सकता है। पूर्णिमा श्राद्ध को पूर्णिमा श्राद्ध तिथि या पूर्णिमा पितृ तर्पण भी कहा जाता है।
पूर्णिमा श्राद्ध : तिथि, महत्व, विधि और पितृ तर्पण का फल
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