पंचांग राशिफल अंक राशिफल भक्ति का मार्ग त्योहार लव कैलकुलेटर
भजन

महिषासुरमर्दिनी स्तोत्र (अयि गिरिनन्दिनि) | संपूर्ण पाठ, हिंदी अर्थ, लाभ, पाठ विधि एवं महत्व

13 मिनट पढ़ें
महिषासुरमर्दिनी स्तोत्र (अयि गिरिनन्दिनि) | संपूर्ण पाठ, हिंदी अर्थ, लाभ, पाठ विधि एवं महत्व

महिषासुरमर्दिनी स्तोत्र क्या है?

महिषासुरमर्दिनी स्तोत्र, जिसे "अयि गिरिनन्दिनि" के नाम से भी जाना जाता है, माँ दुर्गा की महिमा का अत्यंत प्रसिद्ध संस्कृत स्तोत्र है। इसमें देवी दुर्गा के अद्भुत सौंदर्य, अपार शक्ति, करुणा और महिषासुर सहित अनेक असुरों के संहार का भावपूर्ण वर्णन किया गया है।

यह स्तोत्र भारत के लगभग सभी शक्तिपीठों, दुर्गा मंदिरों और नवरात्रि के अवसर पर श्रद्धापूर्वक गाया और पढ़ा जाता है। भक्तों का विश्वास है कि इसके नियमित पाठ से भय, नकारात्मकता, बाधाएँ और शत्रु बाधा दूर होती है तथा माँ दुर्गा की विशेष कृपा प्राप्त होती है।

नोट: इस स्तोत्र की रचना परंपरागत रूप से आदि शंकराचार्य से जोड़ी जाती है, हालांकि इसके ऐतिहासिक लेखन को लेकर विद्वानों में भिन्न मत भी पाए जाते हैं।


महिषासुरमर्दिनी स्तोत्र (अयि गिरिनन्दिनि)

श्लोक 1

अयि गिरिनन्दिनि नन्दितमेदिनि विश्वविनोदिनि नन्दिनुतेगिरिवरविन्ध्यशिरोऽधिनिवासिनि विष्णुविलासिनि जिष्णुनुते ।
 भगवति हे शितिकण्ठकुटुम्बिनि भूरिकुटुम्बिनि भूरिकृते
 जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ १ ॥

अर्थ:
हे पर्वतराज हिमालय की पुत्री! आप सम्पूर्ण पृथ्वी को आनंद देने वाली, संसार का पालन करने वाली और भगवान विष्णु तथा भगवान शिव की प्रिय शक्ति हैं। आपने महिषासुर जैसे अत्याचारी राक्षस का वध करके संसार की रक्षा की। ऐसी जगदम्बा को बार-बार प्रणाम है।

श्लोक 2

सुरवरवर्षिणि दुर्धरधर्षिणि दुर्मुखमर्षिणि हर्षरते
त्रिभुवनपोषिणि शङ्करतोषिणि किल्बिषमोषिणि घोषरते
दनुजनिरोषिणि दितिसुतरोषिणि दुर्मदशोषिणि सिन्धुसुते
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ २ ॥

अर्थ: हे देवी! आप देवताओं पर कृपा की वर्षा करती हैं, दुष्टों का अभिमान तोड़ती हैं, तीनों लोकों का पालन करती हैं और भगवान शंकर को प्रसन्न रखने वाली हैं। आप पापों का नाश करके भक्तों के जीवन में सुख और आनंद भर देती हैं।

श्लोक 3

अयि जगदम्ब मदम्ब कदम्ब वनप्रियवासिनि हासरते
शिखरि शिरोमणि तुङ्गहिमलय शृङ्गनिजालय मध्यगते ।
मधुमधुरे मधुकैटभगञ्जिनि कैटभभञ्जिनि रासरते
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ ३ ॥अर्थ: हे जगत् जननी! आपको पर्वतों, वनों और प्रकृति की सुंदरता अत्यंत प्रिय है। आपने मधु और कैटभ जैसे शक्तिशाली असुरों का संहार करके देवताओं और संसार की रक्षा की। आपकी मधुर मुस्कान और दिव्य स्वरूप भक्तों को आनंद प्रदान करते हैं।


श्लोक 4

अयि शतखण्ड विखण्डितरुण्ड वितुण्डितशुण्द गजाधिपते
रिपुगजगण्ड विदारणचण्ड पराक्रमशुण्ड मृगाधिपते ।
निजभुजदण्ड निपातितखण्ड विपातितमुण्ड भटाधिपते
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ ४ ॥अर्थ: हे देवी! आपने युद्ध में विशाल हाथियों, राक्षस सेनाओं और उनके सेनापतियों का संहार किया। आपकी अद्भुत शक्ति और पराक्रम के सामने कोई भी दुष्ट टिक नहीं सका।

श्लोक 5

अयि रणदुर्मद शत्रुवधोदित दुर्धरनिर्जर शक्तिभृते
चतुरविचार धुरीणमहाशिव दूतकृत प्रमथाधिपते ।
दुरितदुरीह दुराशयदुर्मति दानवदुत कृतान्तमते
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ ५ ॥अर्थ: हे माँ! आपने देवताओं की शक्तियों को संगठित कर असुरों का नाश किया। आप धर्म की रक्षा करने वाली और अधर्म का अंत करने वाली हैं। आपके साहस से देवताओं को विजय प्राप्त हुई।

श्लोक 6

अयि शरणागत वैरिवधुवर वीरवराभय दायकरे
त्रिभुवनमस्तक शुलविरोधि शिरोऽधिकृतामल शुलकरे ।
दुमिदुमितामर धुन्दुभिनादमहोमुखरीकृत दिङ्मकरे
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ ६ ॥अर्थ: जो भी आपकी शरण में आता है, आप उसे निर्भय बना देती हैं। आपके त्रिशूल की शक्ति से दुष्टों का विनाश होता है और आपके विजय घोष से तीनों लोक गूंज उठते हैं।

श्लोक 7

अयि निजहुङ्कृति मात्रनिराकृत धूम्रविलोचन धूम्रशते
समरविशोषित शोणितबीज समुद्भवशोणित बीजलते ।
शिवशिवशुम्भ निशुम्भमहाहव तर्पितभूत पिशाचरते
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ ७ ॥अर्थ: आपने अपने केवल एक हुंकार से धूम्रलोचन का अंत कर दिया। रक्तबीज, शुम्भ और निशुम्भ जैसे भयंकर असुरों का भी आपने संहार किया और संसार को भयमुक्त किया।


श्लोक 8

धनुरनुषङ्ग रणक्षणसङ्ग परिस्फुरदङ्ग नटत्कटके
कनकपिशङ्ग पृषत्कनिषङ्ग रसद्भटशृङ्ग हताबटुके ।
कृतचतुरङ्ग बलक्षितिरङ्ग घटद्बहुरङ्ग रटद्बटुके
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ ८ ॥अर्थ: युद्धभूमि में आपका दिव्य स्वरूप, धनुष-बाण, शस्त्र और सिंह वाहन अत्यंत तेजस्वी दिखाई देते हैं। आपके पराक्रम से पूरी असुर सेना पराजित हो जाती है।


श्लोक 9

सुरललना ततथेयि तथेयि कृताभिनयोदर नृत्यरते
कृत कुकुथः कुकुथो गडदादिकताल कुतूहल गानरते ।
धुधुकुट धुक्कुट धिंधिमित ध्वनि धीर मृदंग निनादरते
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ ९ ॥अर्थ: देवांगनाएँ आपकी विजय पर नृत्य करती हैं। मृदंग, ढोल और अन्य वाद्ययंत्रों की ध्वनि से सम्पूर्ण वातावरण भक्तिमय और आनंदमय हो जाता है।

श्लोक 10

जय जय जप्य जयेजयशब्द परस्तुति तत्परविश्वनुते
झणझणझिञ्झिमि झिङ्कृत नूपुरशिञ्जितमोहित भूतपते ।
नटित नटार्ध नटी नट नायक नाटितनाट्य सुगानरते
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ १० ॥अर्थ: सभी देवता आपकी जय-जयकार करते हैं। आपके नूपुरों की मधुर ध्वनि और आपका दिव्य नृत्य समस्त संसार को मोहित कर देता है।

श्लोक 11

अयि सुमनःसुमनःसुमनः सुमनःसुमनोहरकान्तियुते
श्रितरजनी रजनीरजनी रजनीरजनी करवक्त्रवृते ।
सुनयनविभ्रमर भ्रमरभ्रमर भ्रमरभ्रमराधिपते
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ ११ ॥अर्थ: आपका मुख चन्द्रमा के समान सुंदर है। आपकी मधुर दृष्टि और दिव्य तेज भौंरों की भाँति भक्तों के मन को अपनी ओर आकर्षित कर लेता है।


श्लोक 12

सहितमहाहव मल्लमतल्लिक मल्लितरल्लक मल्लरते
विरचितवल्लिक पल्लिकमल्लिक झिल्लिकभिल्लिक वर्गवृते ।
शितकृतफुल्ल समुल्लसितारुण तल्लजपल्लव सल्ललिते
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ १२ ॥अर्थ: युद्ध में आपकी वीरता और सौंदर्य दोनों अद्भुत हैं। आप दुष्टों का विनाश करते हुए भी भक्तों के प्रति सदा करुणामयी बनी रहती हैं।


श्लोक 13

अविरलगण्ड गलन्मदमेदुर मत्तमतङ्ग जराजपते
त्रिभुवनभुषण भूतकलानिधि रूपपयोनिधि राजसुते ।
अयि सुदतीजन लालसमानस मोहन मन्मथराजसुते
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ १३ ॥अर्थ: आपका रूप अत्यंत मनोहर और अलौकिक है। आपका तेज और सौंदर्य देखकर देवता भी आपकी स्तुति करते हैं। आप सम्पूर्ण सृष्टि की शोभा हैं।


श्लोक 14

कमलदलामल कोमलकान्ति कलाकलितामल भाललते
सकलविलास कलानिलयक्रम केलिचलत्कल हंसकुले ।
अलिकुलसङ्कुल कुवलयमण्डल मौलिमिलद्बकुलालिकुले
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ १४ ॥अर्थ: आपका मुख कमल के समान कोमल और सुंदर है। आपके आसपास प्रकृति, हंस, पुष्प और भौंरे आपकी दिव्यता का गुणगान करते हैं।

श्लोक 15

करमुरलीरव वीजितकूजित लज्जितकोकिल मञ्जुमते
मिलितपुलिन्द मनोहरगुञ्जित रञ्जितशैल निकुञ्जगते ।
निजगणभूत महाशबरीगण सद्गुणसम्भृत केलितले
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ १५ ॥अर्थ: आपकी मधुर वाणी और बाँसुरी जैसी मनमोहक ध्वनि से सम्पूर्ण वन और पर्वत आनंदित हो जाते हैं। आपके साथ रहने वाले गण भी आपके गुणों का गुणगान करते हैं।

श्लोक 16

कटितटपीत दुकूलविचित्र मयुखतिरस्कृत चन्द्ररुचे
प्रणतसुरासुर मौलिमणिस्फुर दंशुलसन्नख चन्द्ररुचे
जितकनकाचल मौलिमदोर्जित निर्भरकुञ्जर कुम्भकुचे
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ १६ ॥अर्थ: आपके वस्त्र, आभूषण और दिव्य तेज चन्द्रमा की आभा को भी फीका कर देते हैं। देवता और असुर दोनों आपके चरणों में नतमस्तक होते हैं।

श्लोक 17

विजितसहस्रकरैक सहस्रकरैक सहस्रकरैकनुते
कृतसुरतारक सङ्गरतारक सङ्गरतारक सूनुसुते ।
सुरथसमाधि समानसमाधि समाधिसमाधि सुजातरते ।
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ १७ ॥अर्थ: आपकी महिमा का वर्णन हजारों हाथों वाले देवता भी पूर्ण रूप से नहीं कर सकते। राजा सुरथ और समाधि वैश्य जैसे भक्तों को भी आपकी कृपा से सिद्धि और मोक्ष प्राप्त हुआ।


श्लोक 18

पदकमलं करुणानिलये वरिवस्यति योऽनुदिनं सुशिवे
अयि कमले कमलानिलये कमलानिलयः स कथं न भवेत् ।
तव पदमेव परम्पदमित्यनुशीलयतो मम किं न शिवे
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ १८ ॥अर्थ: हे करुणामयी माता! जो प्रतिदिन आपके चरणों की भक्ति करता है, उसे परम सुख और परम पद की प्राप्ति होती है। आपके चरण ही मोक्ष का मार्ग हैं।

श्लोक 19

कनकलसत्कलसिन्धुजलैरनुषिञ्चति तेगुणरङ्गभुवम्
भजति स किं न शचीकुचकुम्भतटीपरिरम्भसुखानुभवम् ।
तव चरणं शरणं करवाणि नतामरवाणि निवासि शिवम्
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ १९ ॥अर्थ: जो भक्त श्रद्धा से आपका अभिषेक और पूजा करता है, उसे सांसारिक सुखों के साथ-साथ आध्यात्मिक आनंद भी प्राप्त होता है। आपके चरणों की शरण ही जीवन का सबसे बड़ा आश्रय है।

श्लोक 20

तव विमलेन्दुकुलं वदनेन्दुमलं सकलं ननु कूलयते
किमु पुरुहूतपुरीन्दु मुखी सुमुखीभिरसौ विमुखीक्रियते ।
मम तु मतं शिवनामधने भवती कृपया किमुत क्रियते
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ २० ॥अर्थ: हे माँ! आपका मुख पूर्णिमा के चन्द्रमा के समान निर्मल और शीतल है। आपकी कृपा से भक्त के जीवन में सुख, शांति और मंगल का वास होता है।

श्लोक 21

अयि मयि दीन दयालुतया कृपयैव त्वया भवितव्यमुमे
अयि जगतो जननी कृपयासि यथासि तथानुमितासिरते ।
यदुचितमत्र भवत्युररीकुरुतादुरुतापमपाकुरुते
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ २१ ॥अर्थ: हे माँ उमा! मैं दीन और असहाय हूँ। मुझ पर अपनी असीम कृपा करें। आप सम्पूर्ण जगत की जननी हैं। मेरे दुःखों का नाश करें, मुझे अपनी शरण में रखें और मेरा जीवन सुख, शांति और भक्ति से भर दें।

स्तोत्र का सार

महिषासुरमर्दिनी स्तोत्र माता दुर्गा की शक्ति, करुणा, सौंदर्य और पराक्रम का दिव्य स्तुतिगान है। इसमें देवी को अधर्म का विनाश करने वाली, धर्म की रक्षा करने वाली, भक्तों की पीड़ा हरने वाली और मोक्ष प्रदान करने वाली आदिशक्ति के रूप में प्रणाम किया गया है। जो भक्त श्रद्धा से इस स्तोत्र का पाठ करता है, उसके जीवन से भय, नकारात्मकता और बाधाएँ दूर होती हैं तथा साहस, आत्मविश्वास, समृद्धि और देवी की कृपा प्राप्त होती है।

॥ जय माता दी ॥




महिषासुरमर्दिनी कौन हैं?

महिषासुरमर्दिनी माँ दुर्गा का वह दिव्य स्वरूप है जिसने महिषासुर नामक अत्याचारी असुर का वध किया। देवी महात्म्य (दुर्गा सप्तशती) के अनुसार महिषासुर ने कठोर तपस्या करके ऐसा वरदान प्राप्त किया था कि कोई देवता उसे नहीं मार सकता था।

जब उसका अत्याचार बढ़ गया, तब ब्रह्मा, विष्णु और महेश सहित सभी देवताओं के तेज से आदिशक्ति माँ दुर्गा प्रकट हुईं। देवताओं ने उन्हें अपने दिव्य अस्त्र-शस्त्र प्रदान किए और देवी ने नौ दिनों तक चले भयंकर युद्ध के बाद महिषासुर का वध कर धर्म की रक्षा की।

इसी विजय के स्मरण में शारदीय नवरात्रि और विजयादशमी का पर्व मनाया जाता है।


"अयि गिरिनन्दिनि" का अर्थ क्या है?

स्तोत्र का पहला पद ही इसके नाम का आधार है—

अयि गिरिनन्दिनि नन्दितमेदिनि...

  • अयि – हे माता!

  • गिरिनन्दिनि – पर्वतराज हिमालय की पुत्री

  • नन्दितमेदिनि – पृथ्वी को आनंद देने वाली

  • विश्वविनोदिनि – सम्पूर्ण संसार का कल्याण करने वाली

  • नन्दिनुते – शिवगणों द्वारा स्तुत्य

अर्थात—

"हे हिमालय की पुत्री! आप सम्पूर्ण संसार को आनंद देने वाली, जगत का कल्याण करने वाली और देवताओं द्वारा पूजित आदिशक्ति हैं।"


महिषासुरमर्दिनी स्तोत्र का धार्मिक महत्व

सनातन धर्म में यह स्तोत्र केवल स्तुति नहीं, बल्कि शक्ति, साहस, आत्मविश्वास और धर्म की विजय का प्रतीक माना जाता है।

इसमें देवी को—

  • आदिशक्ति

  • जगदम्बा

  • महिषासुरमर्दिनी

  • शुम्भ-निशुम्भ विनाशिनी

  • रक्तबीज संहारिणी

  • धूम्रलोचन नाशिनी

  • भक्तवत्सला

  • मोक्षदायिनी

रूप में वंदना की गई है।


महिषासुरमर्दिनी स्तोत्र पढ़ने के लाभ

शास्त्रों और परंपराओं के अनुसार श्रद्धा से इस स्तोत्र का पाठ करने पर निम्नलिखित शुभ फल प्राप्त होते हैं—

1. भय का नाश

मानसिक भय, असुरक्षा और नकारात्मक विचारों में कमी आती है।

2. शत्रु बाधा से रक्षा

अन्याय, विरोध और शत्रुओं से सुरक्षा का आशीर्वाद प्राप्त होता है।

3. आत्मविश्वास में वृद्धि

जीवन की कठिन परिस्थितियों का सामना करने की शक्ति मिलती है।

4. मानसिक शांति

क्रोध, तनाव और चिंता कम होती है तथा मन स्थिर होता है।

5. पारिवारिक सुख

घर में सकारात्मक ऊर्जा, प्रेम और सौहार्द बढ़ता है।

6. आध्यात्मिक उन्नति

देवी के प्रति श्रद्धा, भक्ति और आत्मिक जागृति का विकास होता है।

7. कार्यों में सफलता

साहस, निर्णय क्षमता और निरंतर प्रयास की प्रेरणा मिलती है।

ध्यान दें: इन लाभों का आधार धार्मिक मान्यताएँ और भक्तों की आस्था है।


महिषासुरमर्दिनी स्तोत्र कब पढ़ें?

सबसे शुभ समय—

  • प्रतिदिन प्रातःकाल

  • ब्रह्ममुहूर्त

  • नवरात्रि के नौ दिन

  • शुक्रवार

  • अष्टमी

  • नवमी

  • दुर्गाष्टमी

  • विजयादशमी

  • शक्ति साधना के विशेष अवसर


पाठ करने की विधि

  1. प्रातः स्नान करके स्वच्छ वस्त्र पहनें।

  2. माँ दुर्गा की प्रतिमा या चित्र के सामने दीपक जलाएँ।

  3. लाल पुष्प, अक्षत और फल अर्पित करें।

  4. "ॐ दुं दुर्गायै नमः" मंत्र का 11 या 108 बार जप करें।

  5. श्रद्धा से महिषासुरमर्दिनी स्तोत्र का पाठ करें।

  6. अंत में दुर्गा आरती और क्षमा प्रार्थना करें।

  7. प्रसाद वितरित करें।


महिषासुरमर्दिनी स्तोत्र का आध्यात्मिक संदेश

यह स्तोत्र हमें सिखाता है कि—

  • अहंकार का अंत निश्चित है।

  • सत्य और धर्म की सदैव विजय होती है।

  • कठिन परिस्थितियों में धैर्य और साहस नहीं छोड़ना चाहिए।

  • ईश्वर की कृपा और आत्मविश्वास से असंभव भी संभव हो सकता है।

महिषासुर केवल एक राक्षस नहीं, बल्कि हमारे भीतर के अहंकार, क्रोध, लोभ, भय और अज्ञान का भी प्रतीक है। माँ दुर्गा इन आंतरिक विकारों का नाश करने वाली दिव्य शक्ति हैं।


FAQ

क्या महिलाएँ महिषासुरमर्दिनी स्तोत्र पढ़ सकती हैं?

हाँ। यह स्तोत्र सभी श्रद्धालु स्त्री-पुरुष पढ़ सकते हैं।

क्या प्रतिदिन इसका पाठ करना चाहिए?

यदि संभव हो तो प्रतिदिन, अन्यथा शुक्रवार या नवरात्रि में अवश्य करें।

क्या इसे रात में पढ़ सकते हैं?

हाँ, लेकिन प्रातःकाल और संध्या का समय अधिक शुभ माना जाता है।

क्या बिना संस्कृत जाने पाठ कर सकते हैं?

हाँ। शुद्ध भावना सबसे महत्वपूर्ण है। साथ में अर्थ समझकर पढ़ना अधिक लाभदायक माना जाता है।

कितने दिनों तक पाठ करना चाहिए?

कोई निश्चित सीमा नहीं है। नवरात्रि में 9 दिन अथवा नियमित नित्य पाठ दोनों ही शुभ माने जाते हैं।


महिषासुरमर्दिनी स्तोत्र केवल एक स्तुति नहीं, बल्कि धर्म, साहस, करुणा और आत्मबल का दिव्य संदेश है। जो भक्त श्रद्धा और विश्वास से इसका पाठ करता है, उसके जीवन में सकारात्मक ऊर्जा, आत्मविश्वास और माँ दुर्गा की कृपा का संचार होता है। देवी की आराधना का वास्तविक उद्देश्य बाहरी और आंतरिक दोनों प्रकार के अंधकार का नाश कर जीवन में सत्य, शक्ति और सदाचार की स्थापना करना है।

॥ या देवी सर्वभूतेषु शक्तिरूपेण संस्थिता।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः॥