अधिक मास को अतिरिक्त मास, मलमास और पुरुषोत्तम मास के नाम से भी जाना जाता है। हिंदू पंचांग की चंद्र-सौर गणना में समय का संतुलन बनाए रखने के लिए लगभग प्रत्येक तीन वर्ष के अंतराल में एक अतिरिक्त चंद्र मास आता है। धार्मिक परंपरा में इस मास को भगवान विष्णु के पुरुषोत्तम स्वरूप को समर्पित माना जाता है।
अधिक मास को सामान्य रूप से भक्ति, पूजा, जप, तप, दान और धार्मिक साधना के लिए विशेष माना जाता है। इसी कारण इसे पुरुषोत्तम मास भी कहा जाता है।
महत्वपूर्ण: अधिक मास की शुरुआत और समाप्ति की तिथि हर बार एक जैसी नहीं होती। यह पंचांग की खगोलीय गणना पर निर्भर करती है। इसलिए किसी विशेष वर्ष के अधिक मास की तिथि के लिए उस वर्ष के स्थानीय पंचांग को देखना चाहिए।
अधिक मास क्या है?
हिंदू पंचांग में चंद्र मास और सौर वर्ष की अवधि में अंतर होता है। चंद्र वर्ष लगभग 354 दिनों का होता है, जबकि सौर वर्ष लगभग 365 दिनों का होता है। दोनों गणनाओं के बीच बने अंतर को संतुलित करने के लिए समय-समय पर एक अतिरिक्त चंद्र मास जोड़ा जाता है।
इसी अतिरिक्त चंद्र मास को अधिक मास या अतिरिक्त मास कहा जाता है।
जब किसी चंद्र मास में सूर्य की संक्रांति नहीं होती, तब पंचांग की गणना के अनुसार उस मास को अधिक मास के रूप में निर्धारित किया जाता है।
अधिक मास को पुरुषोत्तम मास क्यों कहते हैं?
धार्मिक परंपरा में अधिक मास को भगवान विष्णु के पुरुषोत्तम नाम से जोड़ा जाता है। मान्यता है कि भगवान विष्णु ने इस अतिरिक्त मास को अपने नाम से स्वीकार किया और इसे विशेष धार्मिक महत्व प्रदान किया।
इसी कारण अधिक मास में भगवान विष्णु, श्रीहरि और पुरुषोत्तम भगवान की पूजा, नाम-जप, व्रत, कथा, दान और धार्मिक साधना को विशेष महत्व दिया जाता है।
अधिक मास को मलमास क्यों कहा जाता है?
अधिक मास के लिए मलमास शब्द भी प्रचलित है। हालांकि धार्मिक परंपरा में इसे अशुभ मानकर पूरी तरह त्यागने की अपेक्षा नहीं की जाती। बल्कि पुरुषोत्तम मास की मान्यता के कारण इस समय को भगवान की भक्ति और आध्यात्मिक साधना के लिए महत्वपूर्ण माना जाता है।
विशेष रूप से कामना-प्रधान मांगलिक संस्कारों और कुछ शुभ कार्यों को इस अवधि में न करने की परंपरा कई हिंदू परिवारों और पंचांग परंपराओं में मिलती है।
अधिक मास का धार्मिक महत्व
अधिक मास में भगवान विष्णु की पूजा का विशेष महत्व माना जाता है। भक्त इस समय अपने दैनिक जीवन में धार्मिक गतिविधियों को बढ़ाते हैं।
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार अधिक मास में:
भगवान विष्णु का स्मरण करना शुभ माना जाता है।
विष्णु मंत्र का जाप किया जाता है।
श्रीमद्भगवद्गीता और विष्णु से संबंधित ग्रंथों का पाठ किया जाता है।
भगवान विष्णु को तुलसी दल अर्पित किया जाता है।
व्रत और उपवास किए जाते हैं।
जरूरतमंद लोगों को दान दिया जाता है।
तीर्थ स्नान और धार्मिक यात्राओं का महत्व माना जाता है।
कथा, सत्संग और भजन किए जाते हैं।
अधिक मास में भगवान विष्णु की पूजा
पुरुषोत्तम मास में भगवान विष्णु की पूजा सरल विधि से की जा सकती है।
पूजा सामग्री
भगवान विष्णु की तस्वीर या प्रतिमा
पीले पुष्प
तुलसी दल
चंदन
अक्षत
धूप
दीपक
फल
नैवेद्य
पीले वस्त्र, यदि उपलब्ध हों
पूजा विधि
प्रातःकाल स्नान करके स्वच्छ वस्त्र धारण करें।
पूजा स्थान को साफ करें।
भगवान विष्णु की प्रतिमा या चित्र स्थापित करें।
दीपक और धूप जलाएं।
भगवान विष्णु को चंदन, पुष्प और तुलसी दल अर्पित करें।
भगवान का ध्यान करें।
“ॐ नमो भगवते वासुदेवाय” मंत्र का जाप करें।
विष्णु सहस्रनाम, भगवद्गीता या विष्णु स्तुति का पाठ करें।
भगवान को नैवेद्य अर्पित करें।
अंत में आरती करके प्रार्थना करें।
अधिक मास का प्रमुख मंत्र
अधिक मास में भगवान विष्णु की उपासना के लिए यह मंत्र श्रद्धा से जपा जाता है:
ॐ नमो भगवते वासुदेवाय॥
यह भगवान विष्णु का प्रसिद्ध द्वादशाक्षरी मंत्र माना जाता है।
भक्त अपनी श्रद्धा और सुविधा के अनुसार निश्चित संख्या में मंत्र जाप कर सकते हैं।
अधिक मास में कौन-कौन से पाठ करें?
पुरुषोत्तम मास में भगवान विष्णु से संबंधित धार्मिक ग्रंथों और स्तोत्रों का पाठ किया जाता है।
प्रमुख पाठ
विष्णु सहस्रनाम
श्रीमद्भगवद्गीता
विष्णु पुराण
पुरुषोत्तम मास की कथा
श्रीहरि स्तुति
विष्णु मंत्र
राम नाम जाप
कृष्ण नाम संकीर्तन
भक्त अपनी श्रद्धा और समय के अनुसार इनमें से किसी एक या अधिक पाठ को अपनी दैनिक साधना में शामिल कर सकते हैं।
अधिक मास में व्रत
अधिक मास में कई भक्त अपनी क्षमता के अनुसार व्रत या उपवास रखते हैं। व्रत का स्वरूप व्यक्ति की परंपरा, स्वास्थ्य और संकल्प के अनुसार अलग हो सकता है।
कुछ लोग पूरे मास में सात्त्विक भोजन करते हैं, जबकि कुछ भक्त विशेष तिथियों पर उपवास रखते हैं।
व्रत का उद्देश्य केवल भोजन का त्याग करना नहीं बल्कि मन, वचन और कर्म को संयमित करके भगवान की भक्ति में मन लगाना माना जाता है।
अधिक मास में क्या दान करें?
धार्मिक मान्यता के अनुसार अधिक मास में दान-पुण्य का विशेष महत्व है।
अपनी क्षमता के अनुसार निम्न वस्तुओं का दान किया जा सकता है:
अन्न
वस्त्र
फल
गुड़
घी
पीली वस्तुएं
धार्मिक पुस्तकें
गौसेवा या अन्य सेवा कार्यों में सहयोग
जरूरतमंद लोगों की सहायता
दान हमेशा अपनी क्षमता के अनुसार और जरूरतमंद व्यक्ति की वास्तविक आवश्यकता को ध्यान में रखकर करना चाहिए।
अधिक मास में क्या करना चाहिए?
अधिक मास को धार्मिक साधना के लिए उपयोगी बनाने के लिए भक्त निम्न कार्य कर सकते हैं:
1. भगवान विष्णु का नाम जाप
प्रतिदिन श्रीहरि का नाम स्मरण करें।
2. तुलसी पूजा
भगवान विष्णु को तुलसी प्रिय मानी जाती है। इसलिए श्रद्धापूर्वक तुलसी पूजा एवं तुलसी दल अर्पित किया जाता है।
3. धार्मिक ग्रंथों का पाठ
गीता, विष्णु सहस्रनाम या अन्य धार्मिक ग्रंथों का पाठ किया जा सकता है।
4. दान और सेवा
जरूरतमंदों की सहायता करना और अन्न-वस्त्र आदि का दान करना धार्मिक रूप से पुण्यकारी माना जाता है।
5. सात्त्विक जीवन
क्रोध, अहंकार और अनावश्यक विवादों से बचते हुए संयमित जीवन जीने का प्रयास करें।
अधिक मास में क्या नहीं करना चाहिए?
धार्मिक परंपराओं में अधिक मास के दौरान कुछ काम्य एवं मांगलिक कार्यों को स्थगित रखने की मान्यता है।
आमतौर पर इस अवधि में निम्न प्रकार के कार्यों को लेकर सावधानी बरती जाती है:
विवाह
गृह प्रवेश
उपनयन जैसे मांगलिक संस्कार
बड़े स्तर पर नए शुभ कार्यों का आरंभ
हालांकि इन नियमों में क्षेत्र, संप्रदाय और पंचांग परंपरा के अनुसार अंतर हो सकता है। इसलिए किसी विशेष संस्कार के लिए अपने परिवार की परंपरा या विद्वान आचार्य से परामर्श करना उचित है।
अधिक मास और संक्रांति का संबंध
अधिक मास की पहचान हिंदू पंचांग की विशेष गणना से होती है। जब किसी चंद्र मास के दौरान सूर्य की एक राशि से दूसरी राशि में संक्रांति नहीं होती, तो उस चंद्र मास को अधिक मास के रूप में निर्धारित किया जाता है।
इस कारण अधिक मास का नाम उस सामान्य मास के आधार पर भी समझा जाता है, जैसे अधिक श्रावण, अधिक भाद्रपद आदि।
अधिक मास में तीर्थ स्नान
धार्मिक मान्यता के अनुसार अधिक मास में तीर्थ स्नान, नदी स्नान और धार्मिक स्थलों की यात्रा का विशेष महत्व है।
जो व्यक्ति तीर्थ यात्रा नहीं कर सकता, वह घर पर स्नान के बाद भगवान का स्मरण, पूजा और मंत्र जाप करके अपनी श्रद्धा व्यक्त कर सकता है।
अधिक मास में तुलसी का महत्व
भगवान विष्णु की पूजा में तुलसी का विशेष महत्व माना जाता है। इसलिए पुरुषोत्तम मास में भगवान विष्णु को तुलसी दल अर्पित करना भक्तों की प्रमुख धार्मिक परंपराओं में से एक है।
तुलसी के पौधे की सेवा, दीपदान और पूजा भी श्रद्धा से की जा सकती है।
अधिक मास की कथा
धार्मिक कथाओं में अधिक मास को प्रारंभ में उपेक्षित माना गया और कोई देवता इसे स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं था। इससे अधिक मास ने भगवान विष्णु की शरण ली।
मान्यता के अनुसार भगवान विष्णु ने उसकी प्रार्थना स्वीकार की और उसे अपने पुरुषोत्तम नाम से विभूषित किया। इसी कारण अधिक मास को पुरुषोत्तम मास कहा जाने लगा।
इस कथा का धार्मिक संदेश यह है कि भगवान की शरण और भक्ति से उपेक्षित समझी जाने वाली वस्तु भी विशेष महत्व प्राप्त कर सकती है।
अधिक मास में पुरुषोत्तम भगवान की आराधना
पुरुषोत्तम मास में भक्त भगवान विष्णु के पुरुषोत्तम स्वरूप का ध्यान करते हैं।
सुबह स्नान के बाद भगवान का ध्यान करके इस प्रकार प्रार्थना की जा सकती है:
हे पुरुषोत्तम भगवान,
इस पवित्र मास में हमें अपनी भक्ति प्रदान करें।
हमारे मन को सद्बुद्धि और संयम दें।
हमें धर्म एवं सत्य के मार्ग पर चलने की प्रेरणा दें
और सभी जीवों के प्रति दया एवं सेवा का भाव प्रदान करें।
अधिक मास में किए जाने वाले प्रमुख धार्मिक कार्य
| धार्मिक कार्य | परंपरागत महत्व |
|---|---|
| विष्णु पूजा | श्रीहरि की भक्ति |
| मंत्र जाप | आध्यात्मिक साधना |
| विष्णु सहस्रनाम | भगवान विष्णु का स्मरण |
| गीता पाठ | ज्ञान और धर्म का चिंतन |
| तुलसी पूजा | विष्णु भक्ति से संबंध |
| दान | सेवा और पुण्य भावना |
| व्रत | संयम और साधना |
| कथा-सत्संग | धार्मिक ज्ञान और भक्ति |
अधिक मास में आहार
व्रत करने वाले भक्त अपनी परंपरा के अनुसार फलाहार या सात्त्विक भोजन करते हैं। सामान्य रूप से भोजन में संयम रखने और सात्त्विक आहार को प्राथमिकता देने की धार्मिक परंपरा है।
यदि कोई व्यक्ति स्वास्थ्य संबंधी कारणों से उपवास नहीं कर सकता, तो उसे बिना आवश्यकता कठोर व्रत नहीं करना चाहिए। भक्ति और साधना अपनी क्षमता के अनुसार करना अधिक उचित है।
अधिक मास और शुभ कार्य
अधिक मास में पूजा-पाठ और धार्मिक साधना को शुभ माना जाता है, लेकिन विवाह जैसे मांगलिक संस्कारों के संबंध में अलग धार्मिक नियम प्रचलित हैं।
इसलिए यह समझना जरूरी है कि अधिक मास का अर्थ सभी शुभ कार्यों का निषेध नहीं है। भगवान की पूजा, मंत्र जाप, दान, कथा और सेवा जैसे धार्मिक कार्य किए जाते हैं, जबकि कुछ मांगलिक संस्कारों को परंपरा के अनुसार टाला जाता है।
अधिक मास कितने वर्षों में आता है?
अधिक मास सामान्यतः लगभग हर 32 से 33 महीनों के आसपास एक बार आता है। सरल रूप से इसे लगभग तीन वर्ष के अंतराल पर आने वाला अतिरिक्त चंद्र मास कहा जाता है।
वास्तविक अंतर पंचांग की खगोलीय गणना पर निर्भर करता है।
अधिक मास का आध्यात्मिक संदेश
पुरुषोत्तम मास हमें यह संदेश देता है कि जीवन में अतिरिक्त समय को भी सार्थक बनाया जा सकता है।
इस अवधि में भक्त सांसारिक व्यस्तताओं के बीच कुछ समय भगवान के स्मरण, आत्मचिंतन, सेवा, दान और सदाचार के लिए निकालने का प्रयास करते हैं।
अधिक मास इसलिए केवल पंचांग में जुड़ा हुआ अतिरिक्त महीना नहीं, बल्कि धार्मिक दृष्टि से भक्ति और आत्म-साधना का अवसर माना जाता है।
FAQ: अधिक मास
1. अधिक मास क्या होता है?
हिंदू चंद्र-सौर पंचांग में समय का संतुलन बनाए रखने के लिए जो अतिरिक्त चंद्र मास जोड़ा जाता है, उसे अधिक मास कहते हैं।
2. अधिक मास को पुरुषोत्तम मास क्यों कहा जाता है?
धार्मिक मान्यता के अनुसार भगवान विष्णु ने अधिक मास को अपने पुरुषोत्तम नाम से स्वीकार किया था। इसलिए इसे पुरुषोत्तम मास कहा जाता है।
3. अधिक मास को मलमास क्यों कहते हैं?
अधिक मास के लिए मलमास नाम भी प्रचलित है। यह नाम पारंपरिक पंचांग और धार्मिक साहित्य में मिलता है।
4. अधिक मास में किस भगवान की पूजा करनी चाहिए?
अधिक मास में विशेष रूप से भगवान विष्णु और पुरुषोत्तम भगवान की पूजा का महत्व माना जाता है।
5. अधिक मास में कौन सा मंत्र जाप करें?
“ॐ नमो भगवते वासुदेवाय” मंत्र का जाप भगवान विष्णु की उपासना के लिए किया जा सकता है।
6. क्या अधिक मास में विवाह कर सकते हैं?
कई हिंदू धार्मिक परंपराओं में अधिक मास के दौरान विवाह और कुछ अन्य मांगलिक संस्कारों को नहीं करने की मान्यता है। व्यक्तिगत परिस्थिति में स्थानीय पंचांग और आचार्य की सलाह लेना उचित है।
7. अधिक मास में क्या दान करना चाहिए?
अन्न, वस्त्र, फल, धार्मिक सामग्री और जरूरतमंदों की सहायता जैसे दान अपनी क्षमता के अनुसार किए जा सकते हैं।
8. क्या अधिक मास में व्रत रखना जरूरी है?
नहीं। व्रत श्रद्धा और क्षमता के अनुसार किया जाता है। स्वास्थ्य या अन्य कारणों से व्रत न रख पाने वाला व्यक्ति पूजा, मंत्र जाप, दान और सेवा जैसे अन्य धार्मिक कार्य कर सकता है।
9. अधिक मास कितने साल बाद आता है?
अधिक मास सामान्यतः लगभग 32 से 33 महीनों के अंतराल में आता है, इसलिए इसे आम तौर पर लगभग तीन वर्ष में एक बार आने वाला अतिरिक्त मास कहा जाता है।
10. क्या अधिक मास में पूजा-पाठ कर सकते हैं?
हाँ। धार्मिक परंपरा में अधिक मास को पूजा, जप, तप, कथा, दान और भगवान विष्णु की आराधना के लिए विशेष माना जाता है।
अधिक मास (अतिरिक्त मास/पुरुषोत्तम मास) हिंदू पंचांग की महत्वपूर्ण अवधारणा है। यह चंद्र और सौर वर्ष के बीच संतुलन बनाए रखने के लिए पंचांग में जोड़ा जाने वाला अतिरिक्त चंद्र मास है।
धार्मिक दृष्टि से इसे भगवान विष्णु के पुरुषोत्तम स्वरूप को समर्पित माना जाता है। इस दौरान भक्त पूजा, मंत्र जाप, व्रत, कथा, दान, सेवा और आत्मचिंतन के माध्यम से अपनी आध्यात्मिक साधना को आगे बढ़ाते हैं।
ॐ नमो भगवते वासुदेवाय।
श्री पुरुषोत्तम भगवान की जय।