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भए प्रगट कृपाला – श्रीराम जन्म स्तुति

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भए प्रगट कृपाला – श्रीराम जन्म स्तुति

“भए प्रगट कृपाला, दीनदयाला, कौसल्या हितकारी” श्रीरामचरितमानस के बालकाण्ड में वर्णित भगवान श्रीराम के जन्म प्रसंग की अत्यंत प्रसिद्ध स्तुति है। इसमें माता कौसल्या के सामने भगवान श्रीराम के दिव्य चतुर्भुज स्वरूप में प्रकट होने, माता द्वारा की गई स्तुति तथा भगवान द्वारा बाल रूप धारण करने का सुंदर वर्णन मिलता है।

यह स्तुति भगवान श्रीराम के जन्मोत्सव, विशेषकर श्रीराम नवमी के अवसर पर श्रद्धापूर्वक गाई और पढ़ी जाती है। इसमें भगवान श्रीराम को करुणा के सागर, दीनों पर दया करने वाले और भक्तों के कल्याणकारी स्वरूप में नमन किया गया है।

भए प्रगट कृपाला – संपूर्ण पाठ

भए प्रगट कृपाला, दीनदयाला, कौसल्या हितकारी।
हरषित महतारी, मुनि मन हारी, अद्भुत रूप बिचारी॥

लोचन अभिरामा, तनु घनस्यामा, निज आयुध भुजचारी।
भूषन बनमाला, नयन बिसाला, सोभासिंधु खरारी॥

कह दुइ कर जोरी, अस्तुति तोरी, केहि बिधि करूं अनंता।
माया गुन ग्यानातीत अमाना, वेद पुरान भनंता॥

करुना सुख सागर, सब गुन आगर, जेहि गावहिं श्रुति संता।
सो मम हित लागी, जन अनुरागी, भयउ प्रगट श्रीकंता॥

ब्रह्मांड निकाया, निर्मित माया, रोम रोम प्रति बेद कहै।
मम उर सो बासी, यह उपहासी, सुनत धीर मति थिर न रहै॥

उपजा जब ग्याना, प्रभु मुसुकाना, चरित बहुत बिधि कीन्ह चहै।
कहि कथा सुहाई, मातु बुझाई, जेहि प्रकार सुत प्रेम लहै॥

माता पुनि बोली, सो मति डोली, तजहु तात यह रूपा।
कीजै सिसुलीला, अति प्रियसीला, यह सुख परम अनूपा॥

सुनि बचन सुजाना, रोदन ठाना, होइ बालक सुरभूपा।
यह चरित जे गावहिं, हरिपद पावहिं, ते न परहिं भवकूपा॥

भए प्रगट कृपाला, दीनदयाला, कौसल्या हितकारी।
हरषित महतारी, मुनि मन हारी, अद्भुत रूप बिचारी॥

दोहा

विप्र धेनु सुर संत हित लीन्ह मनुज अवतार।
निज इच्छा निर्मित तनु माया गुन गोपार॥

सियावर रामचंद्र की जय।

“भए प्रगट कृपाला” का सरल अर्थ

भगवान श्रीराम करुणामय और दीनों पर दया करने वाले हैं। वे माता कौसल्या के हित के लिए प्रकट हुए। उनके दिव्य स्वरूप को देखकर माता कौसल्या अत्यंत प्रसन्न हुईं और मुनियों के मन को मोहित करने वाले उस अद्भुत रूप का दर्शन किया।

भगवान श्रीराम का शरीर मेघ के समान श्याम वर्ण का था। उनके नेत्र अत्यंत सुंदर और विशाल थे। वे अपने हाथों में दिव्य आयुध धारण किए हुए थे और वनमाला तथा आभूषणों से सुशोभित थे। उनका स्वरूप मानो सौंदर्य का अथाह समुद्र था।

माता कौसल्या की स्तुति

भगवान के दिव्य स्वरूप का दर्शन करके माता कौसल्या हाथ जोड़कर उनकी स्तुति करती हैं। वे कहती हैं कि हे अनंत प्रभु! आपकी स्तुति किस प्रकार की जाए? आप माया और उसके गुणों से परे हैं। आपके वास्तविक स्वरूप का वर्णन वेद और पुराण भी करते हैं।

माता भगवान को करुणा और सुख का सागर तथा सभी सद्गुणों का भंडार कहती हैं। वे आश्चर्य व्यक्त करती हैं कि जिन भगवान का निवास समस्त ब्रह्मांड में है और जिनके रोम-रोम में अनगिनत ब्रह्मांडों का वर्णन किया जाता है, वही परमात्मा उनके पुत्र के रूप में उनके सामने प्रकट हुए हैं।

भगवान श्रीराम का बाल रूप धारण करना

जब माता कौसल्या को भगवान के दिव्य स्वरूप का ज्ञान होता है, तब भगवान मुस्कुराते हैं और अपनी बाल लीला करने की इच्छा व्यक्त करते हैं। माता कौसल्या भगवान से अपना दिव्य रूप त्यागकर सामान्य बालक का रूप धारण करने का अनुरोध करती हैं, ताकि वे उन्हें पुत्र के रूप में गोद में लेकर वात्सल्य सुख प्राप्त कर सकें।

माता की इच्छा सुनकर भगवान श्रीराम बालक के रूप में रोने लगते हैं। इस प्रकार भगवान अपने भक्तों और माता-पिता के प्रेम को स्वीकार करते हुए बाल लीला करते हैं।

दोहा का भावार्थ

दोहा में भगवान श्रीराम के अवतार का उद्देश्य बताया गया है। भगवान ने ब्राह्मणों, गौ, देवताओं और संतों के हित के लिए मनुष्य रूप में अवतार लिया। उनका शरीर उनकी अपनी इच्छा से निर्मित है और वे माया तथा उसके गुणों से परे हैं।

“भए प्रगट कृपाला” का धार्मिक महत्व

यह स्तुति श्रीराम भक्तों के लिए विशेष भावनात्मक और आध्यात्मिक महत्व रखती है। भगवान श्रीराम का जन्म केवल एक ऐतिहासिक या धार्मिक घटना के रूप में नहीं, बल्कि धर्म, मर्यादा, करुणा और सत्य की स्थापना के प्रतीक के रूप में देखा जाता है।

“दीनदयाला” शब्द भगवान के करुणामय स्वरूप को दर्शाता है। भक्त के लिए इसका संदेश है कि भगवान अपने भक्तों के प्रति करुणा रखते हैं और उनकी शरणागति को स्वीकार करते हैं।

श्रीराम नवमी पर पाठ

श्रीराम नवमी के दिन भगवान श्रीराम के जन्मोत्सव के अवसर पर “भए प्रगट कृपाला” का पाठ और गायन विशेष रूप से किया जाता है। मंदिरों और घरों में राम जन्मोत्सव के दौरान भक्त इस स्तुति को भक्ति भाव से गाते हैं।

इस अवसर पर भगवान श्रीराम का पूजन, श्रीराम नाम का स्मरण, रामचरितमानस का पाठ और आरती भी की जाती है। भक्त भगवान से सत्य, धर्म, मर्यादा और सद्बुद्धि के मार्ग पर चलने की प्रार्थना करते हैं।

इस स्तुति से मिलने वाला संदेश

“भए प्रगट कृपाला” का सबसे सुंदर संदेश भगवान और भक्त के बीच प्रेम का है। भगवान परमात्मा होते हुए भी भक्तों के प्रेम के लिए बाल रूप धारण करते हैं। माता कौसल्या की वात्सल्य भावना और भगवान श्रीराम की बाल लीला इस प्रसंग को अत्यंत भावपूर्ण बनाती है।

यह स्तुति हमें यह भी स्मरण कराती है कि ईश्वर की भक्ति में ज्ञान के साथ प्रेम और समर्पण का भी विशेष महत्व है।

निष्कर्ष

“भए प्रगट कृपाला, दीनदयाला, कौसल्या हितकारी” भगवान श्रीराम के जन्म और बाल लीला का अत्यंत सुंदर भक्तिपूर्ण वर्णन है। इसमें भगवान के दिव्य स्वरूप, माता कौसल्या की स्तुति और भगवान के बाल रूप धारण करने का प्रसंग मिलता है। श्रीराम नवमी तथा दैनिक श्रीराम भक्ति में इस स्तुति का पाठ श्रद्धा और प्रेम से किया जा सकता है।

सियावर रामचंद्र की जय। पवनसुत हनुमान की जय। श्रीराम जय राम जय जय राम।