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मंत्र

नवग्रह शांति एवं भगवान शिव स्तुति मंत्र

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नवग्रह शांति एवं भगवान शिव स्तुति मंत्र

हिंदू धर्म में नवग्रहों की उपासना का विशेष महत्व माना गया है। सूर्य, चंद्रमा, मंगल, बुध, गुरु, शुक्र, शनि तथा राहु-केतु को नवग्रह के रूप में पूजा जाता है। प्रस्तुत मंत्र में नवग्रहों का स्मरण करते हुए भगवान शिव के त्रिनेत्र स्वरूप को प्रणाम किया गया है।

ब्रह्मा मुरारी त्रिपुरांतकारी मंत्र

ब्रह्मा मुरारी त्रिपुरांतकारी भानुः शशी भूमिसुतो बुधश्च।
गुरुः शुक्रः शनिराहुकेतवः सर्वेग्रह गृहभानुरस्तथाः।
सर्वे ग्रहाग्रहभानुसुतान्तकारी यः कस्तु सन्निन्द्र त्रिलोचनाय।
भस्माङ्ग्राग त्रिनयनं विशालक्षम् नमामि तं शिरसा निक्षिपमि॥

मंत्र का भावार्थ

इस स्तुति में ब्रह्मा, मुरारी भगवान विष्णु, त्रिपुर का संहार करने वाले भगवान शिव तथा सूर्य, चंद्रमा, मंगल, बुध, गुरु, शुक्र, शनि, राहु और केतु सहित सभी ग्रहों का स्मरण किया गया है। इसके माध्यम से समस्त ग्रहों के प्रति श्रद्धा व्यक्त करते हुए भगवान शिव के त्रिनेत्र एवं विशाल नेत्रों वाले स्वरूप को प्रणाम किया जाता है।

भगवान शिव को त्रिपुरांतकारी और त्रिलोचन अर्थात तीन नेत्रों वाला कहा गया है। उनके शरीर पर भस्म सुशोभित है और उनका स्वरूप भक्तों के लिए आध्यात्मिक शक्ति एवं संरक्षण का प्रतीक माना जाता है।

नवग्रहों का स्मरण

मंत्र में नवग्रहों के नामों का क्रमशः स्मरण किया गया है। वैदिक एवं हिंदू परंपरा में ग्रहों की उपासना जीवन में संतुलन, शुभता और शांति की कामना के लिए की जाती है।

  • भानु: सूर्य देव
  • शशी: चंद्र देव
  • भूमिसुत: मंगल देव
  • बुध: बुध देव
  • गुरु: बृहस्पति देव
  • शुक्र: शुक्र देव
  • शनि: शनिदेव
  • राहु: राहु
  • केतु: केतु

भगवान शिव के त्रिनेत्र स्वरूप का महत्व

भगवान शिव को त्रिलोचन कहा जाता है, जिसका अर्थ है तीन नेत्रों वाला। शिव का तीसरा नेत्र ज्ञान, चेतना और अज्ञान के विनाश का प्रतीक माना जाता है। मंत्र के अंतिम भाग में भगवान शिव के भस्म से विभूषित, त्रिनेत्र और विशाल नेत्रों वाले स्वरूप को नमन किया गया है।

मंत्र जाप की सामान्य विधि

इस स्तुति का पाठ प्रातःकाल स्नान के बाद अथवा संध्या के समय स्वच्छ स्थान पर किया जा सकता है। भगवान शिव का ध्यान करके दीपक जलाएं और श्रद्धापूर्वक मंत्र का पाठ करें। सोमवार, प्रदोष काल तथा शिव उपासना के विशेष अवसरों पर इसका पाठ करना भक्तिपरंपरा में शुभ माना जाता है।

  1. स्नान करके स्वच्छ वस्त्र धारण करें।
  2. शांत और स्वच्छ स्थान पर भगवान शिव का ध्यान करें।
  3. दीपक एवं धूप अर्पित करें।
  4. नवग्रहों और भगवान शिव का स्मरण करें।
  5. मंत्र का श्रद्धापूर्वक पाठ करें।
  6. अंत में भगवान शिव से सुख, शांति और मंगल की प्रार्थना करें।

नवग्रह शांति के लिए मंत्र का महत्व

ज्योतिषीय और धार्मिक परंपराओं में नवग्रहों की शांति के लिए ग्रह मंत्र, स्तोत्र और भगवान शिव की उपासना की जाती है। यह स्तुति नवग्रहों के स्मरण के साथ शिव के स्वरूप का ध्यान कराती है। हालांकि किसी विशेष ग्रह दोष या ज्योतिषीय समस्या के लिए उपाय करने से पहले योग्य ज्योतिषाचार्य या आचार्य की सलाह लेना उचित है।

पाठ का आध्यात्मिक संदेश

इस मंत्र का मुख्य भाव केवल ग्रहों की शांति तक सीमित नहीं है। इसमें ब्रह्मा, विष्णु, शिव और नवग्रहों का स्मरण करके परम शक्ति के प्रति श्रद्धा व्यक्त की जाती है। भगवान शिव के त्रिनेत्र स्वरूप का ध्यान साधक को ज्ञान, विवेक और आत्मिक शक्ति की ओर प्रेरित करता है।

“ब्रह्मा मुरारी त्रिपुरांतकारी” स्तुति में नवग्रहों के नामों के साथ भगवान शिव के दिव्य स्वरूप का स्मरण किया गया है। श्रद्धा और एकाग्रता के साथ इसका पाठ भगवान शिव की उपासना तथा नवग्रहों के स्मरण के रूप में किया जा सकता है।

ॐ नमः शिवाय। हर हर महादेव।