“जय जय भैरवि असुर भयाउनि” माँ भगवती की शक्ति और पराक्रम का गुणगान करने वाली प्रसिद्ध मैथिली देवी स्तुति है। इस स्तुति में माँ भैरवी के उग्र और शक्तिशाली स्वरूप का वर्णन किया गया है, जो असुरों और दुष्ट शक्तियों का भय दूर करने वाली मानी जाती हैं।
इस पद में माँ को पशुपति भामिनी, अर्थात भगवान शिव की शक्ति के रूप में संबोधित किया गया है। कवि माँ भगवती से सहज बुद्धि, सद्बुद्धि और अपनी शरण में रहने की कृपा प्रदान करने की प्रार्थना करते हैं।
इस प्रसिद्ध देवी-स्तुति को विद्यापति की भक्ति-काव्य परंपरा से जोड़ा जाता है। इसकी भाषा में मैथिली की मधुरता और देवी के उग्र स्वरूप का अद्भुत समन्वय दिखाई देता है।
जय जय भैरवि असुर भयाउनि पाठ
जय जय भैरवि असुर भयाउनि,
जय जय भैरवि असुर भयाउनि,
पशुपति भामिनी माया।
सहज सुमति वर दियउ गोसाउनि,
सहज सुमति वर दियउ गोसाउनि,
अनुगति गति तुअ पाया।
जय जय भैरवि असुर भयाउनि।
वासर रैन सबासन शोभित,
वासर रैन सबासन शोभित,
चरण चन्द्रमणि चूड़ा।
कतओक दैत्य मारि मुख मेलल,
कतओक दैत्य मारि मुख मेलल,
कतओ उगिलि कएल कूड़ा।
जय जय भैरवि असुर भयाउनि।
सामर बरन नयन अनुरंजित,
सामर बरन नयन अनुरंजित,
जलद जोग फुलकोका।
कट कट विकट ओठ पुट पांडरि,
कट कट विकट ओठ पुट पांडरि,
लिधुर फेन उठ फोंका।
जय जय भैरवि असुर भयाउनि।
घन घन घनय घुंघरू कत बाजय,
घन घन घनय घुंघरू कत बाजय,
हन हन कर तुअ काता।
विद्यापति कवि तुअ पद सेवक,
विद्यापति कवि तुअ पद सेवक,
पुत्र बिसरू जनि माता।
जय जय भैरवि असुर भयाउनि।
जय जय भैरवी असुर भयावनी।
जय जय भैरवी असुर भयावनी।
जय जय भैरवि असुर भयाउनि।
नोट: मैथिली के इस पद के अलग-अलग गायन और प्रकाशनों में कुछ शब्दों की वर्तनी/उच्चारण में अंतर मिल सकता है।
जय जय भैरवि असुर भयाउनि का अर्थ
इस स्तुति में कवि माँ भैरवी के उग्र, शक्तिशाली और रक्षक स्वरूप का वर्णन करते हैं। माँ को असुरों और दुष्ट शक्तियों का भय उत्पन्न करने वाली तथा भक्तों की रक्षा करने वाली शक्ति के रूप में स्मरण किया गया है।
“जय जय भैरवि असुर भयाउनि”
इसका भाव है—हे माँ भैरवी! आपकी जय हो, जय हो। आप असुरों और दुष्ट शक्तियों में भय उत्पन्न करने वाली हैं।
“पशुपति भामिनी माया”
माँ को भगवान पशुपति अर्थात भगवान शिव की शक्ति के रूप में संबोधित किया गया है। यहाँ देवी को शिव की दिव्य शक्ति और माया के रूप में स्मरण किया गया है।
“सहज सुमति वर दियउ गोसाउनि”
कवि माँ से प्रार्थना करते हैं कि हे माता! मुझे सहज रूप से अच्छी बुद्धि और सद्बुद्धि का वरदान प्रदान करें।
“अनुगति गति तुअ पाया”
इस पंक्ति में भक्त माँ के चरणों की शरण प्राप्त करने और उनके मार्ग का अनुसरण करने की भावना व्यक्त करता है।
माँ भैरवी के स्वरूप का वर्णन
पद के अगले भाग में माँ भैरवी के भव्य और उग्र स्वरूप का वर्णन मिलता है। उनके चरणों में चंद्रमणि जैसे आभूषणों की शोभा बताई गई है और उनके द्वारा दैत्यों के संहार का चित्र प्रस्तुत किया गया है।
यह वर्णन देवी की शक्ति और दुष्ट शक्तियों के विनाश का प्रतीक माना जा सकता है।
देवी के उग्र स्वरूप का भाव
“सामर बरन नयन अनुरंजित” जैसी पंक्तियों में देवी के स्वरूप, नेत्रों और उनके प्रभाव का काव्यात्मक चित्रण मिलता है। आगे देवी के विकट रूप और उनके युद्धमय स्वरूप की कल्पना दिखाई देती है।
यहाँ देवी केवल सौम्य माता के रूप में नहीं, बल्कि अधर्म और असुर शक्तियों का नाश करने वाली आदिशक्ति के रूप में सामने आती हैं।
घुंघरू और युद्ध का वर्णन
“घन घन घनय घुंघरू कत बाजय” में देवी के चरणों में बंधे घुंघरुओं की ध्वनि का वर्णन किया गया है।
इसके साथ “हन हन कर तुअ काता” जैसी पंक्तियां देवी के युद्ध और दुष्ट शक्तियों के संहार की वीर भावना को प्रकट करती हैं।
इस प्रकार पूरे पद में देवी के वीर, उग्र और रक्षक स्वरूप का प्रभाव दिखाई देता है।
विद्यापति की माँ से प्रार्थना
पद के अंत में कवि स्वयं को देवी के चरणों का सेवक बताते हैं:
“विद्यापति कवि तुअ पद सेवक,
पुत्र बिसरू जनि माता।”
इसका भाव है कि कवि स्वयं को माँ का पुत्र और सेवक मानकर उनसे कभी न भूलने की प्रार्थना करते हैं।
यह पंक्ति पूरे पद को अत्यंत भावुक बना देती है। देवी के उग्र स्वरूप का वर्णन करने के बाद कवि अंततः माँ के वात्सल्य और कृपा की शरण में आ जाते हैं।
जय जय भैरवि असुर भयाउनि का धार्मिक महत्व
यह स्तुति देवी के शक्ति स्वरूप की उपासना से जुड़ी हुई है। इसमें माँ भैरवी को असुरों का भय दूर करने वाली, दुष्ट शक्तियों का संहार करने वाली और भक्तों को सद्बुद्धि प्रदान करने वाली देवी के रूप में स्मरण किया गया है।
मैथिली भक्ति साहित्य में इस प्रकार के देवी पदों का विशेष स्थान है। स्तुति की भाषा में भक्ति, वीर रस और मातृभाव तीनों का सुंदर मेल दिखाई देता है।
जय जय भैरवि असुर भयाउनि कब पढ़ें?
भक्त अपनी श्रद्धा के अनुसार इस देवी स्तुति का पाठ या गायन कर सकते हैं। विशेष रूप से:
नवरात्रि के दौरान
दुर्गा पूजा के अवसर पर
माँ भैरवी की उपासना में
देवी मंदिर में भजन-कीर्तन के समय
सुबह या शाम की पूजा में
धार्मिक एवं सांस्कृतिक कार्यक्रमों में
शक्ति उपासना के अवसर पर
जय जय भैरवि असुर भयाउनि स्तुति का भाव
इस स्तुति का मूल भाव केवल देवी के उग्र स्वरूप का वर्णन करना नहीं है। इसके भीतर भक्त और माता के बीच का गहरा संबंध भी दिखाई देता है।
कवि पहले माँ की अपार शक्ति और असुरों के संहार का वर्णन करते हैं और अंत में स्वयं को उनका पुत्र और सेवक मानकर कहते हैं कि हे माता, अपने पुत्र को मत भूलना।
यही मातृभाव इस स्तुति को विशेष भक्तिमय बनाता है।
माँ भैरवी की उपासना
माँ भैरवी को शक्ति के उग्र स्वरूपों में माना जाता है। देवी उपासना में भक्त अपनी श्रद्धा और परंपरा के अनुसार मंत्र, स्तोत्र, आरती और भजन के माध्यम से देवी का स्मरण करते हैं।
यदि कोई व्यक्ति किसी विशेष तांत्रिक साधना या अनुष्ठान का पालन करना चाहता है, तो उसे योग्य गुरु या आचार्य के मार्गदर्शन में ही करना चाहिए।
जय जय भैरवि असुर भयाउनि FAQ
जय जय भैरवि असुर भयाउनि क्या है?
यह माँ भैरवी की प्रसिद्ध मैथिली देवी-स्तुति है, जिसमें देवी के उग्र, शक्तिशाली और रक्षक स्वरूप का वर्णन किया गया है।
जय जय भैरवि असुर भयाउनि किसने लिखा है?
यह पद विद्यापति की काव्य-परंपरा से प्रसिद्ध रूप से जुड़ा हुआ है।
जय जय भैरवि असुर भयाउनि किस भाषा में है?
यह पद मैथिली भाषा में है और मैथिली देवी-भक्ति साहित्य में इसका विशेष महत्व माना जाता है।
जय जय भैरवि असुर भयाउनि का अर्थ क्या है?
इसका भाव है कि माँ भैरवी की जय हो, जो असुरों और दुष्ट शक्तियों में भय उत्पन्न करने वाली तथा भक्तों की रक्षा करने वाली देवी हैं।
जय जय भैरवि असुर भयाउनि कब पढ़ना चाहिए?
इसका पाठ नवरात्रि, देवी पूजा, भजन-कीर्तन या अपनी दैनिक पूजा में श्रद्धा के अनुसार किया जा सकता है।
इस स्तुति में किस देवी की आराधना की गई है?
इस पद में माँ भैरवी, अर्थात देवी शक्ति के उग्र और रक्षक स्वरूप की आराधना की गई है।
“जय जय भैरवि असुर भयाउनि” माँ भैरवी की शक्ति, पराक्रम और मातृभाव को व्यक्त करने वाली सुंदर मैथिली देवी-स्तुति है। इसमें देवी के उग्र स्वरूप द्वारा असुरों के संहार का वर्णन करने के साथ-साथ भक्त की सरल प्रार्थना भी दिखाई देती है।
अंत में कवि स्वयं को माँ के चरणों का सेवक और पुत्र मानकर उनसे अपने ऊपर कृपा बनाए रखने की प्रार्थना करते हैं। यही भक्ति और मातृभाव इस पद को विशेष बनाता है।
जय माँ भैरवी।
जय माता दी।