पंचांग राशिफल भक्ति का मार्ग त्योहार
चालीसा

माँ अन्नपूर्णा चालीसा | अन्नपूर्णा माता की चालीसा पाठ हिंदी में

3 मिनट पढ़ें

॥ दोहा ॥

विश्वेश्वर पदपदम की रज निज शीश लगाय ।
अन्नपूर्णे, तव सुयश बरनौं कवि मतिलाय ।

॥ चौपाई ॥

नित्य आनंद करिणी माता, वर अरु अभय भाव प्रख्याता ॥
जय ! सौंदर्य सिंधु जग जननी, अखिल पाप हर भव-भय-हरनी ॥
श्वेत बदन पर श्वेत बसन पुनि, संतन तुव पद सेवत ऋषिमुनि ॥
काशी पुराधीश्वरी माता, माहेश्वरी सकल जग त्राता ॥

वृषभारुढ़ नाम रुद्राणी, विश्व विहारिणि जय ! कल्याणी ॥
पतिदेवता सुतीत शिरोमणि, पदवी प्राप्त कीन्ह गिरी नंदिनि ॥
पति विछोह दुःख सहि नहिं पावा, योग अग्नि तब बदन जरावा ॥
देह तजत शिव चरण सनेहू, राखेहु जात हिमगिरि गेहू ॥

प्रकटी गिरिजा नाम धरायो, अति आनंद भवन मँह छायो ॥
नारद ने तब तोहिं भरमायहु, ब्याह करन हित पाठ पढ़ायहु ॥
ब्रहमा वरुण कुबेर गनाये, देवराज आदिक कहि गाये ॥
सब देवन को सुजस बखानी, मति पलटन की मन मँह ठानी ॥

अचल रहीं तुम प्रण पर धन्या, कीहनी सिद्ध हिमाचल कन्या ॥
निज कौ तब नारद घबराये, तब प्रण पूरण मंत्र पढ़ाये ॥
करन हेतु तप तोहिं उपदेशेउ, संत बचन तुम सत्य परेखेहु ॥
गगनगिरा सुनि टरी न टारे, ब्रहां तब तुव पास पधारे ॥

कहेउ पुत्रि वर माँगु अनूपा, देहुँ आज तुव मति अनुरुपा ॥
तुम तप कीन्ह अलौकिक भारी, कष्ट उठायहु अति सुकुमारी ॥
अब संदेह छाँड़ि कछु मोसों,है सौगंध नहीं छल तोसों ॥
करत वेद विद ब्रहमा जानहु,वचन मोर यह सांचा मानहु  ॥

तजि संकोच कहहु निज इच्छा, देहौं मैं मनमानी भिक्षा ॥
सुनि ब्रहमा की मधुरी बानी,मुख सों कछु मुसुकाय भवानी ॥

बोली तुम का कहहु विधाता, तुम तो जगके स्रष्टाधाता ॥
मम कामना गुप्त नहिं तोंसों, कहवावा चाहहु का मोंसों ॥
दक्ष यज्ञ महँ मरती बारा, शंभुनाथ पुनि होहिं हमारा ॥
सो अब मिलहिं मोहिं मनभाये, कहि तथास्तु विधि धाम सिधाये ॥

तब गिरिजा शंकर तव भयऊ, फल कामना संशयो गयऊ ॥
चन्द्रकोटि रवि कोटि प्रकाशा, तब आनन महँ करत निवासा ॥
माला पुस्तक अंकुश सोहै, कर मँह अपर पाश मन मोहै ॥
अन्न्पूर्णे ! सदापूर्णे, अज अनवघ अनंत पूर्णे ॥ 30 ॥

कृपा सागरी क्षेमंकरि माँ, भव विभूति आनंद भरी माँ ॥
कमल विलोचन विलसित भाले, देवि कालिके चण्डि कराले ॥
तुम कैलास मांहि है गिरिजा, विलसी आनंद साथ सिंधुजा ॥

स्वर्ग महालक्ष्मी कहलायी, मर्त्य लोक लक्ष्मी पदपायी ॥
विलसी सब मँह सर्व सरुपा, सेवत तोहिं अमर पुर भूपा ॥
जो पढ़िहहिं यह तव चालीसा, फल पाइंहहि शुभ साखी ईसा ॥

प्रात समय जो जन मन लायो, पढ़िहहिं भक्ति सुरुचि अघिकायो ॥
स्त्री कलत्र पति मित्र पुत्र युत, परमैश्रवर्य लाभ लहि अद्भुत ॥
राज विमुख को राज दिवावै, जस तेरो जन सुजस बढ़ावै ॥
पाठ महा मुद मंगल दाता, भक्त मनोवांछित निधि पाता ॥ 40 ॥

॥ दोहा ॥

जो यह चालीसा सुभग,
पढ़ि नावैंगे माथ ।
तिनके कारज सिद्ध सब,
साखी काशी नाथ ॥