श्री सत्यनारायण भगवान भगवान श्रीहरि विष्णु का सत्यस्वरूप अवतार माने जाते हैं। सत्यनारायण व्रत और कथा का उल्लेख स्कन्द पुराण के रेवाखंड में मिलता है। धार्मिक मान्यता है कि जो व्यक्ति श्रद्धा, सत्य और भक्ति के साथ भगवान सत्यनारायण का व्रत एवं कथा करता है, उसके जीवन में सुख-समृद्धि, शांति और भगवान विष्णु की कृपा बनी रहती है।
सत्यनारायण व्रत किसी भी शुभ अवसर—जैसे गृह प्रवेश, विवाह, संतान प्राप्ति, नया व्यापार, परीक्षा में सफलता, मनोकामना पूर्ति या पूर्णिमा के दिन—किया जा सकता है।
श्री सत्यनारायण भगवान कौन हैं?
भगवान सत्यनारायण, भगवान विष्णु का वह दिव्य स्वरूप हैं जो सत्य, धर्म, करुणा और न्याय का प्रतीक है। "सत्य" का अर्थ है सत्य का पालन और "नारायण" का अर्थ है समस्त सृष्टि के पालनकर्ता भगवान विष्णु।
यह व्रत केवल धन प्राप्ति का माध्यम नहीं, बल्कि सत्य, सेवा, दान और धर्ममय जीवन जीने की प्रेरणा देता है।
सत्यनारायण व्रत का महत्व
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार सत्यनारायण व्रत—
- परिवार में सुख-शांति बनाए रखने की प्रेरणा देता है।
- भगवान विष्णु की भक्ति को मजबूत करता है।
- सत्य बोलने और धर्म का पालन करने की शिक्षा देता है।
- मनोकामनाओं की पूर्ति हेतु श्रद्धापूर्वक किया जाता है।
- शुभ कार्यों से पूर्व किया जाने वाला लोकप्रिय व्रत है।
सत्यनारायण पूजा सामग्री
पूजा में सामान्यतः निम्न सामग्री रखी जाती है—
- भगवान विष्णु अथवा सत्यनारायण भगवान का चित्र
- चौकी एवं पीला वस्त्र
- कलश
- आम के पत्ते
- नारियल
- रोली
- हल्दी
- चावल (अक्षत)
- पंचामृत
- गंगाजल
- तुलसी दल
- पंचफल
- सुपारी
- धूप
- दीप
- घी
- अगरबत्ती
- फूल
- केले
- पान
- लौंग
- इलायची
- नैवेद्य
- पंचामृत
- प्रसाद (सूजी या गेहूं के आटे का हलवा अथवा शिरा)
सत्यनारायण व्रत की पूजा विधि
- प्रातः स्नान कर स्वच्छ वस्त्र धारण करें।
- पूजा स्थान को शुद्ध करें।
- चौकी पर भगवान सत्यनारायण का चित्र स्थापित करें।
- कलश स्थापित करें।
- भगवान गणेश का स्मरण करें।
- भगवान विष्णु एवं माता लक्ष्मी का ध्यान करें।
- पंचामृत से पूजन करें।
- तुलसी दल अर्पित करें।
- नैवेद्य अर्पित करें।
- श्री सत्यनारायण भगवान की कथा पढ़ें अथवा सुनें।
- आरती करें।
- प्रसाद सभी भक्तों में वितरित करें।
श्री सत्यनारायण भगवान की संपूर्ण कथा
प्रथम अध्याय – नारद मुनि का प्रश्न
मंगलाचरण
ॐ श्री गणेशाय नमः।
ॐ नमो भगवते वासुदेवाय।
ॐ श्री सत्यनारायणाय नमः।
एक समय की बात है। नैमिषारण्य नामक पवित्र वन में अनेक ऋषि-मुनि एकत्र होकर सूत जी से कलियुग में प्राणियों के कल्याण का सरल और उत्तम उपाय पूछने लगे। उन्होंने विनम्रतापूर्वक कहा—
"हे सूत जी! कलियुग में मनुष्य अनेक प्रकार के दुःखों, पापों और कष्टों से घिरा रहता है। ऐसा कौन-सा व्रत या साधन है, जिसे करने से मनुष्य के सभी दुःख दूर हों, धन-धान्य, संतान, सुख-समृद्धि तथा अंत में मोक्ष की प्राप्ति हो?"
ऋषियों के इस प्रश्न को सुनकर सूत जी बोले—
"हे मुनिश्रेष्ठों! आपने अत्यंत कल्याणकारी प्रश्न किया है। यह वही कथा है जिसे स्वयं भगवान श्री विष्णु ने देवर्षि नारद को सुनाया था। मैं वही पवित्र कथा आप सबको सुनाता हूँ।"
एक समय देवर्षि नारद जी लोक-लोकांतरों का भ्रमण करते हुए मृत्युलोक पहुँचे। वहाँ उन्होंने देखा कि मनुष्य अपने-अपने कर्मों के अनुसार अनेक प्रकार के दुःख भोग रहे हैं। कोई निर्धन था, कोई रोगी, कोई संतानहीन, तो कोई मानसिक कष्टों से पीड़ित था। यह देखकर उनके हृदय में करुणा उत्पन्न हुई।
नारद जी तुरंत भगवान श्रीहरि विष्णु के धाम वैकुण्ठ पहुँचे। वहाँ उन्होंने भगवान को शंख, चक्र, गदा और पद्म धारण किए हुए, लक्ष्मीजी के साथ दिव्य सिंहासन पर विराजमान देखा। उन्होंने श्रद्धापूर्वक प्रणाम कर कहा—
"हे प्रभु! आप समस्त जगत के पालनकर्ता और भक्तवत्सल हैं। पृथ्वी पर रहने वाले मनुष्य अनेक प्रकार के दुःखों से पीड़ित हैं। कृपया ऐसा सरल व्रत बताइए, जिससे उनके सभी कष्ट दूर हो जाएँ और उन्हें सुख, समृद्धि तथा अंत में मोक्ष की प्राप्ति हो।"
भगवान श्री विष्णु मुस्कराए और बोले—
"हे नारद! तुमने लोककल्याण के लिए अत्यंत उत्तम प्रश्न किया है। मैं तुम्हें एक ऐसा श्रेष्ठ व्रत बताता हूँ, जो सभी मनोकामनाओं को पूर्ण करने वाला है। इसका नाम 'श्री सत्यनारायण व्रत' है। जो मनुष्य श्रद्धा और भक्ति से इस व्रत का पालन करता है तथा मेरी कथा का श्रवण करता है, उसके सभी पाप नष्ट हो जाते हैं। उसे धन, धान्य, संतान, यश, सुख और समृद्धि प्राप्त होती है तथा अंत समय में वह मोक्ष को प्राप्त करता है।"
भगवान ने आगे कहा—
"यह व्रत किसी भी शुभ तिथि, विशेष रूप से पूर्णिमा, एकादशी या संक्रांति के दिन किया जा सकता है। प्रातः स्नान करके या संध्या समय शुद्ध स्थान पर मेरा पूजन करें। पंचामृत, तुलसी दल, फल, फूल, धूप, दीप और नैवेद्य अर्पित करें। गेहूँ के आटे, घी, दूध, चीनी अथवा सूजी से बना प्रसाद अर्पित करें। इसके बाद श्रद्धापूर्वक श्री सत्यनारायण व्रत कथा का श्रवण करें और अंत में प्रसाद सभी भक्तों में वितरित करें।"
भगवान ने कहा—
"जो मनुष्य श्रद्धा, विश्वास और सत्यभाव से इस व्रत को करता है, उसकी सभी मनोकामनाएँ पूर्ण होती हैं। जीवन के संकट दूर होते हैं, परिवार में सुख-शांति आती है और मेरी विशेष कृपा उस पर बनी रहती है।"
भगवान के वचन सुनकर देवर्षि नारद अत्यंत प्रसन्न हुए। उन्होंने भगवान को प्रणाम किया और पृथ्वी पर आकर इस पवित्र व्रत का प्रचार किया, जिससे असंख्य लोगों का कल्याण हुआ।
॥ इति श्री सत्यनारायण व्रत कथा प्रथम अध्याय समाप्त ॥
श्री सत्यनारायण व्रत कथा – द्वितीय अध्याय
निर्धन ब्राह्मण की कथा
एक समय काशी नगरी में एक अत्यंत निर्धन ब्राह्मण रहता था। वह प्रतिदिन भिक्षा माँगकर अपना जीवन-यापन करता था। निर्धनता के कारण उसे अनेक कष्ट सहने पड़ते थे, फिर भी वह धर्मपरायण, सत्यनिष्ठ और भगवान का भक्त था।
एक दिन भगवान श्री सत्यनारायण ने उसकी दयनीय अवस्था देखकर वृद्ध ब्राह्मण का रूप धारण किया और उसके पास पहुँचे। उन्होंने प्रेमपूर्वक पूछा—
"हे विप्र! तुम इतने दुःखी और चिंतित क्यों रहते हो?"
ब्राह्मण ने विनम्रतापूर्वक उत्तर दिया—
"हे महात्मन्! मैं अत्यंत निर्धन हूँ। भिक्षा से जो कुछ प्राप्त होता है, उसी से अपना जीवन चलाता हूँ। कृपया ऐसा उपाय बताइए जिससे मेरा और मेरे परिवार का कल्याण हो सके।"
वृद्ध ब्राह्मण रूपधारी भगवान ने कहा—
"यदि तुम श्रद्धा और भक्ति से श्री सत्यनारायण भगवान का व्रत एवं पूजन करोगे, तो तुम्हारे सभी दुःख दूर हो जाएँगे। तुम्हें धन, धान्य, सुख-समृद्धि तथा जीवन में सफलता प्राप्त होगी।"
इतना कहकर भगवान अंतर्धान हो गए। निर्धन ब्राह्मण समझ गया कि वे कोई साधारण मनुष्य नहीं, स्वयं भगवान श्री सत्यनारायण थे।
अगले दिन ब्राह्मण ने भिक्षा माँगी। उस दिन उसे पहले की अपेक्षा अधिक भिक्षा प्राप्त हुई। उसने मन ही मन निश्चय किया कि जो कुछ भी प्राप्त होगा, उसमें से आवश्यक सामग्री एकत्र कर भगवान श्री सत्यनारायण का व्रत करेगा।
कुछ ही दिनों में उसने पूजा की सामग्री एकत्र की। शुभ तिथि में स्नान कर शुद्ध मन से भगवान श्री सत्यनारायण का विधिपूर्वक पूजन किया, कथा का श्रवण किया और प्रसाद भक्तों में वितरित किया।
भगवान की कृपा से उसकी निर्धनता दूर हो गई। उसके घर में धन-धान्य, सुख-समृद्धि और आनंद का वास होने लगा। वह प्रत्येक मास श्रद्धापूर्वक श्री सत्यनारायण व्रत करने लगा तथा दूसरों को भी इस व्रत का महत्व बताने लगा।
एक दिन उस ब्राह्मण ने कई लोगों को इस व्रत की महिमा सुनाई। उनमें एक लकड़हारा भी था। उसने श्रद्धापूर्वक व्रत की विधि पूछी और मन में संकल्प किया कि यदि उसे उस दिन अच्छी कमाई होगी तो वह भी श्री सत्यनारायण भगवान का व्रत करेगा।
॥ इति श्री सत्यनारायण व्रत कथा द्वितीय अध्याय समाप्त ॥
श्री सत्यनारायण व्रत कथा – तृतीय अध्याय
लकड़हारे की कथा
जब निर्धन ब्राह्मण ने श्री सत्यनारायण भगवान के व्रत का महात्म्य सुनाया, तब वहाँ उपस्थित एक लकड़हारा भी श्रद्धापूर्वक वह कथा सुन रहा था। उसने ब्राह्मण से व्रत की संपूर्ण विधि पूछी और मन ही मन संकल्प किया—
"यदि आज मुझे लकड़ियाँ बेचकर अच्छी आय प्राप्त होगी, तो मैं भगवान श्री सत्यनारायण का व्रत अवश्य करूँगा।"
यह संकल्प लेकर वह वन में लकड़ियाँ काटने गया। उस दिन भगवान की कृपा से उसे सामान्य दिनों की अपेक्षा अधिक लकड़ियाँ मिलीं। जब वह उन्हें नगर में बेचने पहुँचा, तो उसकी सारी लकड़ियाँ शीघ्र ही अच्छे मूल्य पर बिक गईं। इससे वह अत्यंत प्रसन्न हुआ।
संकल्प का स्मरण करते हुए उसने पूजा के लिए आवश्यक सामग्री—केले, फल, फूल, तुलसी दल, धूप, दीप, नैवेद्य, गेहूँ का आटा, घी, दूध और शक्कर आदि खरीदे। फिर अपने घर जाकर परिवार तथा पड़ोसियों को बुलाया और श्रद्धा, भक्ति तथा विधिपूर्वक श्री सत्यनारायण भगवान का पूजन किया।
पूजन के उपरांत उसने श्री सत्यनारायण व्रत कथा का श्रवण किया, भगवान की आरती उतारी और प्रसाद सभी भक्तों में वितरित किया। उसने पूरे मन से भगवान से प्रार्थना की कि उसके परिवार पर सदैव अपनी कृपा बनाए रखें।
भगवान श्री सत्यनारायण की कृपा से कुछ ही समय में उसका जीवन बदल गया। उसके घर में धन-धान्य, सुख-समृद्धि और वैभव का आगमन हुआ। परिवार में आनंद और शांति बनी रहने लगी। वह नियमित रूप से भगवान का व्रत करता और दूसरों को भी इस व्रत की महिमा सुनाकर प्रेरित करता था।
इस प्रकार जो भी मनुष्य श्रद्धा, सत्य और विश्वास के साथ श्री सत्यनारायण भगवान का व्रत करता है तथा कथा का श्रवण करता है, उसके सभी कष्ट दूर होते हैं और उसे धर्म, अर्थ, काम तथा अंत में मोक्ष की प्राप्ति होती है।
॥ इति श्री सत्यनारायण व्रत कथा तृतीय अध्याय समाप्त ॥
श्री सत्यनारायण व्रत कथा – चतुर्थ अध्याय
साधु वैश्य, लीलावती एवं कलावती की कथा
एक समय की बात है। एक नगर में साधु नाम का एक धनी और धर्मात्मा वैश्य रहता था। उसकी पत्नी का नाम लीलावती था। दोनों अत्यंत सदाचारी और भगवान के भक्त थे, परंतु उनके कोई संतान नहीं थी। संतान प्राप्ति की इच्छा से वे सदा भगवान से प्रार्थना करते रहते थे।
एक दिन उस नगर में श्री सत्यनारायण भगवान के व्रत का आयोजन हो रहा था। साधु वैश्य वहाँ पहुँचा और श्रद्धापूर्वक व्रत कथा सुनी। उसने भगवान के समक्ष संकल्प किया—
"हे प्रभु! यदि आपकी कृपा से मुझे संतान की प्राप्ति होगी, तो मैं अवश्य श्री सत्यनारायण भगवान का व्रत करूँगा।"
भगवान की कृपा से कुछ समय बाद लीलावती ने एक सुंदर कन्या को जन्म दिया। उसका नाम कलावती रखा गया। कन्या दिन-प्रतिदिन बड़ी होने लगी, किंतु संतान प्राप्ति के बाद भी साधु वैश्य अपने संकल्प को भूल गया और श्री सत्यनारायण भगवान का व्रत नहीं किया।
समय बीतता गया। जब कलावती विवाह योग्य हुई, तब उसका विवाह एक योग्य और सुशील युवक से कर दिया गया। विवाह के बाद भी साधु वैश्य ने अपने संकल्प को पूरा नहीं किया।
कुछ समय पश्चात साधु वैश्य अपने दामाद के साथ व्यापार करने के लिए समुद्र पार दूसरे देश गया। वहाँ उसने अनेक प्रकार के व्यापार किए और बहुत-सा धन अर्जित किया। तभी भगवान श्री सत्यनारायण ने उसकी परीक्षा लेने का विचार किया।
एक दिन उसी राज्य में चोरी हो गई। चोर राजकोष का धन लेकर भाग रहे थे। पीछा किए जाने पर उन्होंने चोरी का सामान साधु वैश्य के डेरे के पास फेंक दिया और स्वयं भाग निकले। सैनिक जब वहाँ पहुँचे तो उन्हें वही धन साधु वैश्य के पास मिला। बिना पूरी जाँच किए उन्होंने साधु वैश्य और उसके दामाद को चोर समझकर बंदी बना लिया।
राजा के आदेश से दोनों को कारागार में डाल दिया गया और उनका सारा धन तथा व्यापारिक सामान राजकोष में जमा कर लिया गया।
उधर घर पर लीलावती और कलावती को इस घटना का कोई समाचार नहीं था। धीरे-धीरे उनके घर की सारी संपत्ति समाप्त हो गई। वे अत्यंत दुःखी होकर कठिन जीवन बिताने लगीं।
एक दिन कलावती भोजन की खोज में निकली। मार्ग में उसने एक स्थान पर श्री सत्यनारायण भगवान का व्रत और कथा होते देखी। वह श्रद्धापूर्वक वहाँ बैठ गई, कथा सुनी, आरती में सम्मिलित हुई और प्रसाद ग्रहण करके घर लौटी। उसने अपनी माता लीलावती को पूरी बात बताई।
लीलावती को तुरंत अपने पति का भूला हुआ संकल्प याद आया। अगले ही दिन माँ-बेटी ने श्रद्धा और भक्ति से श्री सत्यनारायण भगवान का विधिपूर्वक व्रत किया, कथा सुनी, आरती की और प्रसाद भक्तों में वितरित किया। उन्होंने भगवान से अपने पति और दामाद की कुशलता तथा शीघ्र वापसी के लिए प्रार्थना की।
भगवान श्री सत्यनारायण उनकी भक्ति से प्रसन्न हुए। उसी रात राजा को स्वप्न में भगवान ने दर्शन देकर कहा—
"हे राजन्! जिन दो व्यापारियों को तुमने कारागार में बंद किया है, वे निर्दोष हैं। उन्हें तुरंत सम्मान सहित मुक्त कर दो और उनका समस्त धन लौटा दो। अन्यथा तुम्हें और तुम्हारे राज्य को भारी कष्ट सहने पड़ेंगे।"
प्रातःकाल राजा ने स्वप्न का स्मरण किया। उसने तुरंत साधु वैश्य और उसके दामाद को कारागार से मुक्त कराया, उनसे क्षमा माँगी और उनका समस्त धन-संपत्ति लौटाकर सम्मान सहित विदा किया।
इस प्रकार भगवान श्री सत्यनारायण ने अपने भक्तों की रक्षा की और यह सिद्ध किया कि जो व्यक्ति श्रद्धा से व्रत करता है, उसकी सभी विपत्तियाँ दूर हो जाती हैं।
॥ इति श्री सत्यनारायण व्रत कथा चतुर्थ अध्याय समाप्त ॥
श्री सत्यनारायण व्रत कथा – पंचम अध्याय
साधु वैश्य द्वारा प्रसाद का अनादर एवं भगवान की कृपा
राजा के आदेश से जब साधु वैश्य और उसका दामाद सम्मानपूर्वक मुक्त कर दिए गए तथा उनका समस्त धन वापस मिल गया, तब वे अत्यंत प्रसन्न होकर अपने नगर की ओर लौटने लगे।
मार्ग में भगवान श्री सत्यनारायण ने एक संन्यासी (वृद्ध ब्राह्मण) का रूप धारण किया और साधु वैश्य से पूछा—
"हे व्यापारी! तुम्हारी नौका में क्या भरा हुआ है?"
साधु वैश्य को अपने धन का अभिमान हो गया। उसने असत्य बोलते हुए उत्तर दिया—
"इसमें तो केवल पत्ते और लताएँ भरी हैं।"
भगवान ने मुस्कराकर कहा—
"तथास्तु! जैसा तुम कहते हो, वैसा ही हो जाए।"
जब साधु वैश्य ने नौका में जाकर देखा, तो उसमें रखा सारा बहुमूल्य धन, रत्न और व्यापारिक सामान वास्तव में पत्तों और लताओं में परिवर्तित हो चुका था। यह देखकर वह अत्यंत दुःखी हुआ। उसे तुरंत अपनी भूल का एहसास हुआ कि उसने भगवान के समक्ष असत्य कहा है।
वह तुरंत उस संन्यासी के चरणों में गिर पड़ा और बोला—
"हे प्रभु! मुझसे अज्ञानवश बहुत बड़ा अपराध हो गया। कृपया मुझे क्षमा करें। मैं आपकी शरण में हूँ।"
भगवान श्री सत्यनारायण उसकी सच्ची पश्चातापपूर्ण प्रार्थना से प्रसन्न हुए और बोले—
"जो मनुष्य सत्य का त्याग करता है, उसे कष्ट अवश्य मिलता है। किंतु जो अपनी भूल स्वीकार कर श्रद्धा और भक्ति से मेरी शरण में आता है, मैं उस पर अवश्य कृपा करता हूँ।"
इतना कहते ही नौका का समस्त धन और व्यापारिक सामग्री पुनः पहले की भाँति हो गई। साधु वैश्य ने भगवान को बार-बार प्रणाम किया और मन में निश्चय किया कि अब वह अपने संकल्प को कभी नहीं भूलेगा।
उधर नगर में लीलावती और कलावती को साधु वैश्य के लौटने का समाचार मिला। दोनों ने भगवान का पूजन किया और प्रसाद ग्रहण किया। उसी समय कलावती अपने पति के स्वागत की उत्सुकता में बिना प्रसाद ग्रहण किए ही नदी तट की ओर दौड़ पड़ी।
भगवान श्री सत्यनारायण ने प्रसाद के अनादर को देखकर उसकी परीक्षा ली। देखते ही देखते वह नौका, जिसमें उसका पति बैठा था, जल में अदृश्य हो गई। यह देखकर कलावती विलाप करने लगी।
तभी आकाशवाणी हुई—
"हे पुत्री! तुमने भगवान के प्रसाद का अनादर किया है। पहले श्रद्धा से प्रसाद ग्रहण करो, फिर तुम्हें अपना पति पुनः प्राप्त होगा।"
कलावती तुरंत घर लौटी। उसने श्रद्धापूर्वक भगवान श्री सत्यनारायण का प्रसाद ग्रहण किया और पुनः नदी तट पर पहुँची। भगवान की कृपा से नौका फिर से प्रकट हो गई और उसका पति सकुशल मिल गया।
साधु वैश्य, लीलावती, कलावती और उनके दामाद ने भगवान श्री सत्यनारायण का विधिपूर्वक पूजन किया, कथा सुनी, आरती की और प्रसाद सभी भक्तों में वितरित किया। इसके बाद वे जीवनभर श्रद्धा, भक्ति और सत्यभाव से श्री सत्यनारायण व्रत करते रहे। उनके घर में सुख, शांति, धन-धान्य और समृद्धि का वास रहा तथा अंत समय में उन्हें भगवान के परम धाम की प्राप्ति हुई।
व्रत का महात्म्य
जो भी स्त्री या पुरुष श्रद्धा, भक्ति और सत्यभाव से श्री सत्यनारायण भगवान का व्रत करता है, कथा का श्रवण करता है, प्रसाद का सम्मान करता है तथा उसे भक्तों में वितरित करता है, उसके समस्त दुःख दूर हो जाते हैं। उसे धन, धान्य, संतान, यश, सुख, समृद्धि तथा अंत में मोक्ष की प्राप्ति होती है।
॥ इति श्री सत्यनारायण व्रत कथा पंचम अध्याय समाप्त ॥
॥ श्री सत्यनारायण भगवान की जय ॥
॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय नमः ॥
षष्ठ अध्याय – राजा तुंगध्वज की कथा
राजा तुंगध्वज एक धर्मात्मा राजा थे, लेकिन एक बार उन्होंने अहंकारवश सत्यनारायण भगवान की पूजा की उपेक्षा कर दी।
उन्होंने प्रसाद भी ग्रहण नहीं किया।
कुछ समय बाद उनका राज्य, धन और परिवार संकट में पड़ गया।
उन्हें अपनी भूल का ज्ञान हुआ।
उन्होंने भगवान सत्यनारायण का व्रत किया और श्रद्धापूर्वक प्रसाद ग्रहण किया।
भगवान की कृपा से उन्हें पुनः राज्य, सुख और समृद्धि प्राप्त हुई।
कथा से मिलने वाली शिक्षा
सत्यनारायण कथा हमें सिखाती है—
- सदैव सत्य बोलें।
- ईश्वर पर विश्वास रखें।
- किए गए संकल्प को पूरा करें।
- प्रसाद का सम्मान करें।
- अहंकार का त्याग करें।
- परिश्रम और ईमानदारी से जीवन जिएँ।
- दान और सेवा करें।
- धर्म के मार्ग पर चलें।
श्री सत्यनारायण भगवान की आरती
ॐ जय लक्ष्मी रमणा, स्वामी जय लक्ष्मी रमणा।
सत्यनारायण स्वामी, जन पातक हरणा॥
रत्न जड़ित सिंहासन, अद्भुत छवि राजे।
नारद करत निरंतर, घंटा ध्वनि बाजे॥
ॐ जय लक्ष्मी रमणा...
प्रकट भए कलि कारण, द्विज को दरस दियो।
बूढ़ो ब्राह्मण बनकर, कंचन महल कियो॥
ॐ जय लक्ष्मी रमणा...
दुर्बल भील कठारो, जिन पर कृपा करी।
चन्द्रचूड़ एक राजा, तिनकी विपत्ति हरी॥
ॐ जय लक्ष्मी रमणा...
वैश्य मनोरथ पाया, श्रद्धा तज दीन्ही।
सो फल भोग्यो प्रभुजी, फिर स्तुति किन्हीं॥
ॐ जय लक्ष्मी रमणा...
भाव-भक्ति के कारण, छिन-छिन रूप धर्यो।
श्रद्धा धारण कीन्ही, तिनको काज सर्यो॥
ॐ जय लक्ष्मी रमणा...
ग्वाल-बाल संग राजा, वन में भक्ति करी।
मनवांछित फल दीन्हो, दीनदयाल हरि॥
ॐ जय लक्ष्मी रमणा...
चढ़त प्रसाद सवाया, कदली फल मेवा।
धूप दीप तुलसी से, राजी सत्यदेवा॥
ॐ जय लक्ष्मी रमणा...
श्री सत्यनारायण जी की आरती, जो कोई नर गावे।
कहत शिवानंद स्वामी, मनवांछित फल पावे॥
ॐ जय लक्ष्मी रमणा, स्वामी जय लक्ष्मी रमणा।
सत्यनारायण स्वामी, जन पातक हरणा॥
व्रत का उद्यापन
यदि किसी विशेष मनोकामना हेतु कई बार व्रत किया गया हो तो अंतिम व्रत में—
- ब्राह्मण भोजन
- कन्या पूजन
- प्रसाद वितरण
- दान
- विष्णु सहस्रनाम पाठ
करना शुभ माना जाता है।
FAQ
क्या सत्यनारायण व्रत केवल पूर्णिमा को किया जाता है?
नहीं। यद्यपि पूर्णिमा को इसका विशेष महत्व है, लेकिन इसे किसी भी शुभ दिन किया जा सकता है।
क्या महिलाएं भी सत्यनारायण व्रत कर सकती हैं?
हाँ, महिलाएं एवं पुरुष दोनों श्रद्धापूर्वक यह व्रत कर सकते हैं।
क्या बिना पंडित के कथा कर सकते हैं?
हाँ। श्रद्धा और विधि के अनुसार स्वयं भी पूजा एवं कथा की जा सकती है।
क्या प्रसाद ग्रहण करना आवश्यक है?
हाँ। धार्मिक परंपरा के अनुसार प्रसाद का सम्मानपूर्वक ग्रहण करना शुभ माना जाता है।
श्री सत्यनारायण भगवान की कथा केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि सत्य, श्रद्धा, विनम्रता और धर्ममय जीवन का संदेश है। कथा के प्रत्येक प्रसंग से यह शिक्षा मिलती है कि ईश्वर पर विश्वास, सत्य का पालन, किए गए वचनों का सम्मान और प्रसाद का आदर जीवन में सुख, शांति और संतुलन लाते हैं। श्रद्धा के साथ सत्यनारायण व्रत एवं कथा का आयोजन परिवार और समाज में सकारात्मकता, भक्ति और सदाचार की भावना को बढ़ावा देता है।