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कनकधारा स्तोत्र | संपूर्ण पाठ, अर्थ, महत्व, लाभ एवं पाठ विधि

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कनकधारा स्तोत्र | संपूर्ण पाठ, अर्थ, महत्व, लाभ एवं पाठ विधि

कनकधारा स्तोत्र

कनकधारा स्तोत्र माता महालक्ष्मी की महिमा का अत्यंत प्रसिद्ध एवं चमत्कारिक स्तोत्र है। इसकी रचना आदि शंकराचार्य ने की थी। मान्यता है कि एक बार बालक शंकराचार्य भिक्षा के लिए एक अत्यंत निर्धन ब्राह्मण परिवार के घर पहुँचे। घर में देने के लिए कुछ भी नहीं था, फिर भी गृहिणी ने श्रद्धापूर्वक एक आँवला (आमलक) भिक्षा में अर्पित कर दिया।

गृहिणी की निःस्वार्थ भावना और करुणा से प्रभावित होकर आदि शंकराचार्य ने माता महालक्ष्मी की स्तुति में कनकधारा स्तोत्र की रचना की। उनकी प्रार्थना से प्रसन्न होकर माता लक्ष्मी ने उस घर पर स्वर्ण (कनक) की वर्षा कर दी। तभी से इस स्तोत्र को कनकधारा स्तोत्र कहा जाने लगा।

आज भी श्रद्धा और नियमपूर्वक इस स्तोत्र का पाठ करने से माता लक्ष्मी की कृपा, आर्थिक उन्नति, सौभाग्य और समृद्धि प्राप्त होने की मान्यता है।


कनकधारा स्तोत्र (संपूर्ण पाठ)

अङ्गं हरेः पुलकभूषणमाश्रयन्ती
भृङ्गाङ्गनेव मुकुलाभरणं तमालम् ।
अङ्गीकृताखिलविभूतिरपाङ्गलीला
माङ्गल्यदास्तु मम मङ्गलदेवतायाः ॥१॥

मुग्धा मुहुर्विदधती वदने मुरारेः
प्रेमत्रपाप्रणिहितानि गतागतानि ।
माला दृशोर्मधुकरीव महोत्पले या
सा मे श्रियं दिशतु सागरसम्भवायाः ॥२॥

विश्वामरेन्द्रपदविभ्रमदानदक्षम्_
आनन्दहेतुरधिकं मुरविद्विषोऽपि ।
ईषन्निषीदतु मयि क्षणमीक्षणार्धम्_
इन्दीवरोदरसहोदरमिन्दिरायाः ॥३॥

आमीलिताक्षमधिगम्य मुदा मुकुन्दम्_
आनन्दकन्दमनिमेषमनङ्गतन्त्रम् ।
आकेकरस्थितकनीनिकपक्ष्मनेत्रं
भूत्यै भवेन्मम भुजङ्गशयाङ्गनायाः ॥४॥

बाह्वन्तरे मधुजितः श्रितकौस्तुभे या
हारावलीव हरिनीलमयी विभाति ।
कामप्रदा भगवतोऽपि कटाक्षमाला
कल्याणमावहतु मे कमलालयायाः ॥५॥

कालाम्बुदालिललितोरसि कैटभारेर्_
धाराधरे स्फुरति या तडिदङ्गनेव ।
मातुः समस्तजगतां महनीयमूर्तिर्_
भद्राणि मे दिशतु भार्गवनन्दनायाः ॥६॥

प्राप्तं पदं प्रथमतः किल यत्प्रभावान्
माङ्गल्यभाजि मधुमाथिनि मन्मथेन ।
मय्यापतेत्तदिह मन्थरमीक्षणार्धं
मन्दालसं च मकरालयकन्यकायाः ॥७॥

दद्याद् दयानुपवनो द्रविणाम्बुधाराम्_
अस्मिन्नकिञ्चनविहङ्गशिशौ विषण्णे ।
दुष्कर्मघर्ममपनीय चिराय दूरं
नारायणप्रणयिनीनयनाम्बुवाहः ॥८॥

इष्टा विशिष्टमतयोऽपि यया दयार्द्र_
दृष्ट्या त्रिविष्टपपदं सुलभं लभन्ते ।
दृष्टिः प्रहृष्टकमलोदरदीप्तिरिष्टां
पुष्टिं कृषीष्ट मम पुष्करविष्टरायाः ॥९॥

गीर्देवतेति गरुडध्वजसुन्दरीति
शाकम्भरीति शशिशेखरवल्लभेति ।
सृष्टिस्थितिप्रलयकेलिषु संस्थितायै
तस्यै नमस्त्रिभुवनैकगुरोस्तरुण्यै ॥१०॥

श्रुत्यै नमोऽस्तु शुभकर्मफलप्रसूत्यै
रत्यै नमोऽस्तु रमणीयगुणार्णवायै ।
शक्त्यै नमोऽस्तु शतपत्रनिकेतनायै
पुष्ट्यै नमोऽस्तु पुरुषोत्तमवल्लभायै ॥११॥

नमोऽस्तु नालीकनिभाननायै
नमोऽस्तु दुग्धोदधिजन्मभूत्यै ।
नमोऽस्तु सोमामृतसोदरायै
नमोऽस्तु नारायणवल्लभायै ॥१२॥

सम्पत्कराणि सकलेन्द्रियनन्दनानि
साम्राज्यदानविभवानि सरोरुहाक्षि ।
त्वद्वन्दनानि दुरिताहरणोद्यतानि
मामेव मातरनिशं कलयन्तु मान्ये ॥१३॥

यत्कटाक्षसमुपासनाविधिः
सेवकस्य सकलार्थसम्पदः ।
संतनोति वचनाङ्गमानसैस्_
त्वां मुरारिहृदयेश्वरीं भजे ॥१४॥

सरसिजनिलये सरोजहस्ते
धवलतमांशुकगन्धमाल्यशोभे ।
भगवति हरिवल्लभे मनोज्ञे
त्रिभुवनभूतिकरि प्रसीद मह्यम् ॥१५॥

दिग्घस्तिभिः कनककुम्भमुखावसृष्ट_
स्वर्वाहिनीविमलचारुजलप्लुताङ्गीम् ।
प्रातर्नमामि जगतां जननीमशेष_
लोकाधिनाथगृहिणीममृताब्धिपुत्रीम् ॥१६॥

कमले कमलाक्षवल्लभे
त्वं करुणापूरतरङ्गितैरपाङ्गैः ।
अवलोकय मामकिञ्चनानां
प्रथमं पात्रमकृत्रिमं दयायाः ॥१७॥

स्तुवन्ति ये स्तुतिभिरमूभिरन्वहं
त्रयीमयीं त्रिभुवनमातरं रमाम् ।
गुणाधिका गुरुतरभाग्यभागिनो
भवन्ति ते भुवि बुधभाविताशयाः ॥१८॥
- आदि शंकराचार्य कृत

कनकधारा स्तोत्र का अर्थ

कनकधारा स्तोत्र में आदि शंकराचार्य ने माता महालक्ष्मी के दिव्य स्वरूप, करुणा, सौंदर्य और कृपा का अत्यंत काव्यमय वर्णन किया है। प्रत्येक श्लोक में माता लक्ष्मी से यह प्रार्थना की गई है कि वे अपने कृपापूर्ण कटाक्ष से भक्त के जीवन में धन, समृद्धि, सौभाग्य, शांति और मंगल का संचार करें। यह स्तोत्र केवल भौतिक संपन्नता ही नहीं, बल्कि आध्यात्मिक उन्नति और सदाचार का भी संदेश देता है।


कनकधारा स्तोत्र का महत्व

  • माता महालक्ष्मी की कृपा प्राप्त करने का अत्यंत प्रभावशाली स्तोत्र।

  • आर्थिक कठिनाइयों से मुक्ति की प्रार्थना।

  • व्यापार, नौकरी और जीवन में उन्नति का प्रतीक।

  • दीपावली, धनतेरस और शुक्रवार की पूजा में विशेष महत्व।

  • आध्यात्मिक शांति और सकारात्मक ऊर्जा प्रदान करने वाला स्तोत्र।


कनकधारा स्तोत्र के पाठ के लाभ

  • धन एवं समृद्धि की प्राप्ति की कामना।

  • आर्थिक बाधाओं और दरिद्रता से मुक्ति की प्रार्थना।

  • व्यापार और करियर में उन्नति।

  • परिवार में सुख-शांति एवं सौहार्द।

  • मानसिक तनाव में कमी।

  • आत्मविश्वास और सकारात्मक सोच में वृद्धि।

  • माता महालक्ष्मी की विशेष कृपा प्राप्त होने की मान्यता।


कनकधारा स्तोत्र का पाठ कब करें?

निम्न अवसरों पर इसका पाठ विशेष फलदायी माना जाता है—

  • प्रत्येक शुक्रवार

  • दीपावली

  • धनतेरस

  • अक्षय तृतीया

  • शरद पूर्णिमा

  • कोजागरी पूर्णिमा

  • किसी नए व्यवसाय या गृह प्रवेश के समय

  • प्रतिदिन प्रातःकाल


कनकधारा स्तोत्र का पाठ कैसे करें?

  1. प्रातः स्नान कर स्वच्छ वस्त्र धारण करें।

  2. माता लक्ष्मी और भगवान विष्णु का ध्यान करें।

  3. घी का दीपक एवं धूप प्रज्वलित करें।

  4. कमल अथवा लाल पुष्प अर्पित करें।

  5. श्रद्धापूर्वक कनकधारा स्तोत्र का पाठ करें।

  6. अंत में लक्ष्मी जी की आरती करें और प्रसाद ग्रहण करें।


कनकधारा स्तोत्र और श्री सूक्त में अंतर

कनकधारा स्तोत्रश्री सूक्त
आदि शंकराचार्य द्वारा रचितऋग्वेद का वैदिक सूक्त
21 श्लोकों का स्तोत्रवैदिक मंत्रों का संग्रह
लक्ष्मी कृपा एवं दरिद्रता निवारण की प्रार्थनासमृद्धि, ऐश्वर्य एवं मंगल की वैदिक प्रार्थना
भक्ति एवं स्तुति प्रधानयज्ञ, हवन एवं वैदिक पूजा में व्यापक उपयोग

कनकधारा स्तोत्र से जुड़े सामान्य प्रश्न (FAQs)

1. कनकधारा स्तोत्र किसने लिखा?

कनकधारा स्तोत्र की रचना जगद्गुरु आदि शंकराचार्य ने माता महालक्ष्मी की स्तुति में की थी।

2. कनकधारा स्तोत्र में कितने श्लोक हैं?

परंपरागत रूप से कनकधारा स्तोत्र में 21 श्लोक हैं।

3. कनकधारा स्तोत्र का पाठ कब करना चाहिए?

शुक्रवार, दीपावली, धनतेरस, अक्षय तृतीया अथवा प्रतिदिन प्रातःकाल इसका पाठ शुभ माना जाता है।

4. क्या कनकधारा स्तोत्र आर्थिक उन्नति के लिए पढ़ा जाता है?

धार्मिक मान्यताओं के अनुसार श्रद्धा और नियमपूर्वक इसका पाठ करने से माता महालक्ष्मी की कृपा तथा आर्थिक समृद्धि की कामना की जाती है।

5. क्या महिलाएं और पुरुष दोनों इसका पाठ कर सकते हैं?

हाँ, कोई भी श्रद्धालु शुद्ध मन और श्रद्धा के साथ कनकधारा स्तोत्र का पाठ कर सकता है।


कनकधारा स्तोत्र माता महालक्ष्मी की कृपा प्राप्त करने के लिए सबसे प्रसिद्ध स्तोत्रों में से एक है। इसमें भक्तिभाव, करुणा और समृद्धि का अद्भुत संगम दिखाई देता है। नियमित श्रद्धापूर्वक पाठ करने से जीवन में सकारात्मकता, आत्मविश्वास और ईश्वर के प्रति आस्था बढ़ती है। धार्मिक मान्यता है कि माता महालक्ष्मी अपने भक्तों पर कृपा कर उन्हें सुख, शांति और समृद्धि का आशीर्वाद प्रदान करती हैं।

॥ ॐ श्रीं महालक्ष्म्यै नमः ॥