04 Mar 2026 आध्यात्मिक मार्गदर्शन विश्वसनीय जानकारी

प्रदोष व्रत | तिथि, महत्व, पूजा विधि और कथा

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प्रदोष व्रत हिंदू धर्म में एक महत्वपूर्ण व्रत है जो भगवान शिव की उपासना के लिए रखा जाता है। यह व्रत त्रयोदशी तिथि (हिंदू कैलेंडर के 13वें दिन) को मनाया जाता है और महीने में दो बार, एक बार शुक्ल पक्ष (पूर्णिमा के बाद) और एक बार कृष्ण पक्ष (अमावस्या के बाद) को आता है। प्रदोष व्रत का पालन करने से भगवान शिव की कृपा प्राप्त होती है और सभी प्रकार के कष्टों और पापों का नाश होता है। रोहिणी व्रत का पालन करने से आध्यात्मिक उन्नति, सुख और समृद्धि की प्राप्ति होती है। इस व्रत का पालन श्रद्धा और भक्ति के साथ करने से भगवान वासुपूज्य की कृपा मिलती है और सभी कष्टों का निवारण होता है। प्रदोष व्रत की कथा भगवान शिव की महिमा और इस व्रत के महत्व को दर्शाती है। इस कथा का पालन करने से व्रतधारी को भगवान शिव की कृपा प्राप्त होती है और सभी प्रकार के कष्टों और पापों से मुक्ति मिलती है।

प्रदोष व्रत की कथा

प्राचीन काल में एक नगर में एक ब्राह्मण और उसकी पत्नी रहते थे। वे दोनों भगवान शिव के परम भक्त थे और नियमित रूप से प्रदोष व्रत का पालन करते थे। लेकिन उनकी कोई संतान नहीं थी, जिससे वे बहुत दुखी रहते थे। उन्होंने कई बार भगवान शिव से प्रार्थना की और अंततः एक दिन उन्हें भगवान शिव के दर्शन हुए। भगवान शिव ने ब्राह्मण दंपत्ति से कहा, "तुम दोनों ने प्रदोष व्रत का बहुत श्रद्धा और भक्ति के साथ पालन किया है। मैं तुम्हारी भक्ति से प्रसन्न हूं और तुम्हें एक पुत्र का वरदान देता हूं।" भगवान शिव के आशीर्वाद से उन्हें एक सुंदर और बुद्धिमान पुत्र की प्राप्ति हुई। उनका जीवन खुशहाल हो गया और उन्होंने अपने पुत्र को भी भगवान शिव की भक्ति और प्रदोष व्रत का महत्व सिखाया।

एक और कथा

एक बार भगवान शिव के परम भक्त चंद्रशेखर अपने गांव में रहते थे। वे हर त्रयोदशी को प्रदोष व्रत का पालन करते थे। एक दिन एक निर्धन व्यक्ति उनके पास आया और उनसे अपने कष्टों का निवारण करने की प्रार्थना की। चंद्रशेखर ने उसे प्रदोष व्रत करने की सलाह दी निर्धन व्यक्ति ने भगवान शिव की आराधना करते हुए प्रदोष व्रत का पालन किया। भगवान शिव उसकी भक्ति से प्रसन्न होकर प्रकट हुए और उसके सभी कष्टों को दूर किया। उसने भगवान शिव का आशीर्वाद प्राप्त किया और उसके जीवन में सुख और समृद्धि आ गई।

विधवा ब्राह्‌मणी की कथा

पूर्वकाल में एक विधवा ब्राह्‌मणी अपने पुत्रों को लेकर ऋषियों की आज्ञा से भिक्षा लेने जाती और संध्या को लौटती। भिक्षा में जो मिलता उससे अपना कार्य चलाती और शिवजी का प्रदोष व्रत भी करती। एक दिन उससे विदर्भ देश का राजकुमार मिला, जिसे शत्रुओं ने राजधानी से बाहर निकाल दिया था और उसके पिता को मार दिया था। ब्राह्‌मणी ने लाकर उसका पालन किया। एक दिन राजकुमार और ब्राह्‌मण बालक ने वन में गंधर्व कन्याओं को देखा। राजकुमार अंशुमती से बात करने लगा और उसके साथ चला गया, ब्राह्‌मण बालक घर लौट आया। अंशुमती के माता-पिता ने अंशुमती का विवाह राजकुमार धर्मगुप्त के साथ कर दिया और शत्रुओं को परास्त कर विदर्भ का राजा बनाया। धर्मगुप्त को ब्राह्‌मण की याद रही और उसने ब्राह्‌मण कुमार को अपना मंत्री बना लिया। यथार्थ में यह शिवजी के प्रदोष व्रत का फल था। तभी से यह शिवजी का प्रदोष व्रत लोक प्रसिद्ध हुआ। इस व्रत के प्रभाव से सभी मनोकामनाओं की पूर्ति होती है।

प्रदोष व्रत का महत्व

भगवान शिव की कृपा:प्रदोष व्रत का पालन करने से भगवान शिव की विशेष कृपा प्राप्त होती है। शिवपुराण के अनुसार, इस व्रत को करने से व्यक्ति को सभी पापों से मुक्ति मिलती है और उसे मोक्ष की प्राप्ति होती है। सुख और समृद्धि: इस व्रत का पालन करने से घर में सुख, शांति और समृद्धि आती है। यह व्रत व्यक्ति की सभी इच्छाओं को पूरा करने में सहायक होता है। स्वास्थ्य लाभ:प्रदोष व्रत का पालन करने से स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं का निवारण होता है और व्यक्ति को निरोगी काया प्राप्त होती है।

प्रदोष व्रत की विधि

स्नान और शुद्धिकरण:व्रत के दिन प्रातःकाल स्नान करके शुद्ध वस्त्र धारण करें।

पूजा की तैयारी:वशिवलिंग या भगवान शिव की मूर्ति के सामने पूजा की थाली सजाएं जिसमें धूप, दीप, चंदन, पुष्प, फल, और नैवेद्य रखें। व्रत का संकल्प: वभगवान शिव का ध्यान करते हुए व्रत का संकल्प लें। पूजा और आरती: शाम के समय सूर्यास्त से पहले भगवान शिव की पूजा और आरती करें। शिव चालीसा, महामृत्युंजय मंत्र, और शिव पुराण का पाठ करें। व्रत का पालन: दिनभर उपवास रखें। कुछ लोग फलाहार या जल का सेवन करते हैं, जबकि कुछ निर्जल व्रत भी रखते हैं। धार्मिक ग्रंथों का पाठ: दिनभर धार्मिक ग्रंथों का पाठ करें और भगवान शिव की लीलाओं का स्मरण करें। व्रत का पारण: अगले दिन प्रातःकाल स्नान करके भगवान शिव की पूजा के बाद व्रत का पारण करें। रोहिणी व्रत, जो भगवान वासुपूज्य की आराधना और उनकी कृपा प्राप्त करने के लिए जैन धर्म के अनुयायियों द्वारा मनाया जाता है, प्रदोष व्रत का पालन श्रद्धा और भक्ति के साथ करने से भगवान शिव की कृपा प्राप्त होती है और सभी प्रकार के कष्टों का नाश होता है।

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