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रामाष्टक – श्रीराम की स्तुति, संपूर्ण पाठ, महत्व, लाभ और पाठ विधि

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रामाष्टक – श्रीराम की स्तुति, संपूर्ण पाठ, महत्व, लाभ और पाठ विधि

रामाष्टक भगवान श्रीराम को समर्पित एक भक्तिपूर्ण स्तोत्र है। इसमें भगवान श्रीराम के दिव्य स्वरूप, मर्यादा, करुणा, धर्म और भक्तवत्सल रूप की स्तुति की जाती है। श्रद्धापूर्वक रामाष्टक का पाठ करने से मन में शांति, भक्ति और सकारात्मक भाव उत्पन्न होने की मान्यता है।

भगवान श्रीराम को मर्यादा पुरुषोत्तम, धर्म के रक्षक और सत्य के आदर्श के रूप में पूजा जाता है। रामाष्टक का नियमित पाठ श्रीराम के प्रति श्रद्धा और समर्पण को मजबूत करने वाला माना जाता है।

रामाष्टक क्या है?

'रामाष्टक' शब्द दो शब्दों से मिलकर बना है—राम + अष्टक। अष्टक का अर्थ आठ श्लोकों या आठ पदों से संबंधित स्तुति से है। रामाष्टक में भगवान श्रीराम की महिमा का सुंदर वर्णन किया गया है।

श्रीराम की उपासना विशेष रूप से धर्म, सत्य, संयम, आदर्श जीवन और सदाचार से जुड़ी मानी जाती है। इसलिए रामाष्टक का पाठ केवल धार्मिक दृष्टि से ही नहीं, बल्कि आत्मिक शांति और सकारात्मक चिंतन के लिए भी किया जाता है।

रामाष्टक का महत्व

हिंदू धर्म में भगवान श्रीराम को भगवान विष्णु का अवतार माना गया है। श्रीराम का जीवन सत्य, त्याग, कर्तव्य और मर्यादा का आदर्श प्रस्तुत करता है।

रामाष्टक का पाठ करते समय भक्त भगवान श्रीराम के दिव्य स्वरूप का ध्यान करते हुए उनकी शरण में जाने की भावना रखता है। नियमित पाठ से भगवान राम के प्रति भक्ति और श्रद्धा बढ़ाने की परंपरा है।

रामाष्टक का पाठ कब करें?

रामाष्टक का पाठ किसी भी दिन श्रद्धापूर्वक किया जा सकता है। विशेष रूप से इन अवसरों पर इसका पाठ शुभ माना जाता है:

  • श्रीराम नवमी
  • राम नवमी के नवरात्र
  • सोमवार, मंगलवार और गुरुवार
  • रामायण या सुंदरकांड पाठ के समय
  • प्रातःकाल स्नान के बाद
  • संध्या के समय पूजा के दौरान
  • मानसिक अशांति या तनाव के समय भगवान श्रीराम का ध्यान करते हुए

श्री रामाष्टकम् – संपूर्ण संस्कृत पाठ

॥ श्रीरामाष्टकम् ॥

भजे विशेषसुन्दरं समस्तपापखण्डनम्।
स्वभक्तचित्तरञ्जनं सदैव राममद्वयम्॥१॥

जटाकलापशोभितं समस्तपापनाशकम्।
स्वभक्तभीतिभञ्जनं भजे ह राममद्वयम्॥२॥

निजस्वरूपबोधकं कृपाकरं भवापहम्।
समं शिवं निरञ्जनं भजे ह राममद्वयम्॥३॥

सहप्रपञ्चकल्पितं ह्यनामरूपवास्तवम्।
निराकृतिं निरामयं भजे ह राममद्वयम्॥४॥

निष्प्रपञ्चनिर्विकल्पनिर्मलं निरामयम्।
चिदेकरूपसन्ततं भजे ह राममद्वयम्॥५॥

भवाब्धिपोतरूपकं ह्यशेषदेहकल्पितम्।
गुणाकरं कृपाकरं भजे ह राममद्वयम्॥६॥

महावाक्यबोधकैर्विराजमानवाक्पदैः।
परं ब्रह्मसद्व्यापकं भजे ह राममद्वयम्॥७॥

शिवप्रदं सुखप्रदं भवच्छिदं भ्रमापहम्।
विराजमानदैशिकं भजे ह राममद्वयम्॥८॥

॥ फलश्रुति ॥

रामाष्टकं पठति यः सुखदं सुपुण्यं
व्यासेन भाषितमिदं शृणुते मनुष्यः।
विद्यां श्रियं विपुलसौख्यमनन्तकीर्तिं
सम्प्राप्य देहविलये लभते च मोक्षम्॥९॥

॥ इति श्रीव्यासविरचितं रामाष्टकं सम्पूर्णम्॥

पाठ संबंधी टिप्पणी: अलग-अलग पुस्तकों और परंपराओं में रामाष्टक के पाठ में छोटे पाठांतर मिल सकते हैं। ऊपर दिया गया पाठ “भजे विशेषसुन्दरं…” वाले व्यास-विरचित संस्करण के आधार पर है। उपलब्ध प्रकाशित पाठ में भी यही 8 स्तोत्र-पद और उसके बाद फलश्रुति दी गई है।


रामाष्टक का हिंदी अर्थ

श्लोक 1 – भगवान श्रीराम का सुंदर स्वरूप

भजे विशेषसुन्दरं समस्तपापखण्डनम्।
स्वभक्तचित्तरञ्जनं सदैव राममद्वयम्॥१॥

हिंदी अर्थ:
मैं उन अद्वितीय भगवान श्रीराम की भक्ति करता हूँ, जो अत्यंत सुंदर हैं, समस्त पापों का नाश करने वाले हैं और अपने भक्तों के हृदय को आनंद से भर देते हैं।

इस श्लोक में श्रीराम के सुंदर, करुणामय और भक्तों को आनंद प्रदान करने वाले स्वरूप की स्तुति की गई है।

श्लोक 2 – भय का नाश करने वाले श्रीराम

जटाकलापशोभितं समस्तपापनाशकम्।
स्वभक्तभीतिभञ्जनं भजे ह राममद्वयम्॥२॥

हिंदी अर्थ:
मैं उन अद्वितीय भगवान श्रीराम का भजन करता हूँ, जिनका स्वरूप जटाओं से सुशोभित है, जो पापों का नाश करने वाले तथा अपने भक्तों के भय को दूर करने वाले हैं।

यह श्लोक भगवान श्रीराम के रक्षक और भय का निवारण करने वाले स्वरूप को दर्शाता है।

श्लोक 3 – कृपा और आत्मज्ञान प्रदान करने वाले

निजस्वरूपबोधकं कृपाकरं भवापहम्।
समं शिवं निरञ्जनं भजे ह राममद्वयम्॥३॥

हिंदी अर्थ:
मैं उन भगवान श्रीराम का भजन करता हूँ जो अपने वास्तविक स्वरूप का ज्ञान कराने वाले, कृपा के सागर और संसाररूपी बंधन से मुक्त करने वाले हैं। वे समान भाव वाले, कल्याणस्वरूप और निष्कलंक हैं।

इस श्लोक में श्रीराम को केवल अयोध्या के राजा के रूप में नहीं, बल्कि आध्यात्मिक ज्ञान और मुक्ति के स्वरूप के रूप में नमन किया गया है।

श्लोक 4 – निराकार और निर्विकार स्वरूप

सहप्रपञ्चकल्पितं ह्यनामरूपवास्तवम्।
निराकृतिं निरामयं भजे ह राममद्वयम्॥४॥

हिंदी अर्थ:
मैं उन अद्वितीय भगवान श्रीराम की उपासना करता हूँ जो संपूर्ण प्रपंच के आधार हैं, जिनका वास्तविक स्वरूप नाम और रूप से परे है तथा जो निराकार और सभी प्रकार के दोषों से रहित हैं।

यहाँ श्रीराम के परम ब्रह्म स्वरूप का वर्णन मिलता है।

श्लोक 5 – शुद्ध चैतन्य स्वरूप

निष्प्रपञ्चनिर्विकल्पनिर्मलं निरामयम्।
चिदेकरूपसन्ततं भजे ह राममद्वयम्॥५॥

हिंदी अर्थ:
मैं उन अद्वितीय भगवान श्रीराम का भजन करता हूँ जो संसार के प्रपंच से परे, विकल्परहित, निर्मल और रोग-दोष से रहित हैं तथा निरंतर शुद्ध चैतन्य स्वरूप हैं।

यह श्लोक श्रीराम के आध्यात्मिक और ब्रह्मस्वरूप का वर्णन करता है।

श्लोक 6 – संसार-सागर से पार लगाने वाले

भवाब्धिपोतरूपकं ह्यशेषदेहकल्पितम्।
गुणाकरं कृपाकरं भजे ह राममद्वयम्॥६॥

हिंदी अर्थ:
मैं उन अद्वितीय भगवान श्रीराम का भजन करता हूँ जो संसाररूपी समुद्र को पार कराने वाली नौका के समान हैं, समस्त जीवों में विद्यमान हैं तथा गुणों और करुणा के भंडार हैं।

इस श्लोक में श्रीराम को संसार के बंधनों से मुक्ति दिलाने वाला आश्रय बताया गया है।

श्लोक 7 – परब्रह्म स्वरूप श्रीराम

महावाक्यबोधकैर्विराजमानवाक्पदैः।
परं ब्रह्मसद्व्यापकं भजे ह राममद्वयम्॥७॥

हिंदी अर्थ:
मैं उन अद्वितीय भगवान श्रीराम का भजन करता हूँ जिनका स्वरूप महान आध्यात्मिक वचनों द्वारा जाना जाता है और जो सर्वव्यापी परम ब्रह्म हैं।

इस श्लोक में श्रीराम को सर्वव्यापी परम तत्व के रूप में स्वीकार किया गया है।

श्लोक 8 – सुख और कल्याण प्रदान करने वाले

शिवप्रदं सुखप्रदं भवच्छिदं भ्रमापहम्।
विराजमानदैशिकं भजे ह राममद्वयम्॥८॥

हिंदी अर्थ:
मैं उन अद्वितीय भगवान श्रीराम की उपासना करता हूँ जो कल्याण और सुख प्रदान करने वाले, संसार के बंधन को समाप्त करने वाले तथा अज्ञान और भ्रम को दूर करने वाले हैं। वे श्रेष्ठ गुरु के रूप में प्रकाशमान हैं।


रामाष्टक की फलश्रुति का अर्थ

रामाष्टकं पठति यः सुखदं सुपुण्यं
व्यासेन भाषितमिदं शृणुते मनुष्यः।
विद्यां श्रियं विपुलसौख्यमनन्तकीर्तिं
सम्प्राप्य देहविलये लभते च मोक्षम्॥

हिंदी अर्थ:
जो मनुष्य इस सुखद और पुण्यदायक रामाष्टक का पाठ करता है या इसे श्रद्धापूर्वक सुनता है, उसे विद्या, समृद्धि, सुख और यश की प्राप्ति होने की धार्मिक मान्यता है। अंततः भगवान की कृपा से मोक्ष की प्राप्ति का वर्णन फलश्रुति में किया गया है।


रामाष्टक पाठ की सरल विधि

  1. स्नान करके स्वच्छ वस्त्र धारण करें।

  2. पूजा स्थान पर भगवान श्रीराम, माता सीता, लक्ष्मण जी और हनुमान जी का स्मरण करें।

  3. दीपक जलाएं।

  4. भगवान श्रीराम को पुष्प अर्पित करें।

  5. कुछ समय शांत होकर श्रीराम का ध्यान करें।

  6. श्रद्धा और एकाग्रता के साथ रामाष्टक का पाठ करें।

  7. अंत में “श्री राम जय राम जय जय राम” का जाप कर सकते हैं।

  8. भगवान श्रीराम से परिवार और सभी प्राणियों के कल्याण की प्रार्थना करें।

रामाष्टक पाठ के लाभ

धार्मिक मान्यताओं के अनुसार रामाष्टक के पाठ से:

  • मन में शांति और सकारात्मकता बढ़ती है।

  • भगवान श्रीराम के प्रति श्रद्धा मजबूत होती है।

  • भय और नकारात्मक विचारों से मन को राहत मिल सकती है।

  • व्यक्ति को धर्म और सदाचार के मार्ग पर चलने की प्रेरणा मिलती है।

  • आध्यात्मिक चिंतन और आत्मिक अनुशासन को बढ़ावा मिलता है।

  • भगवान श्रीराम के करुणामय और रक्षक स्वरूप का स्मरण होता है।

इन लाभों को धार्मिक एवं आध्यात्मिक मान्यताओं के रूप में समझना चाहिए।

रामाष्टक के साथ कौन सा मंत्र जपें?

रामाष्टक के पाठ के बाद निम्न लोकप्रिय राम मंत्र का जाप किया जा सकता है:

॥ श्री राम जय राम जय जय राम ॥

इसके अलावा:

॥ ॐ श्री रामाय नमः ॥

का जाप भी श्रद्धापूर्वक किया जा सकता है।

रामाष्टक और श्रीराम भक्ति

भगवान श्रीराम का जीवन सत्य, धर्म, मर्यादा, त्याग और कर्तव्य का आदर्श प्रस्तुत करता है। रामाष्टक में श्रीराम के इसी दिव्य स्वरूप का स्मरण किया जाता है।

रामाष्टक का पाठ केवल एक स्तोत्र-पाठ नहीं, बल्कि भगवान श्रीराम के प्रति भक्ति, समर्पण और आत्मचिंतन का माध्यम भी बनाया जा सकता है।


रामाष्टक FAQ

1. रामाष्टक क्या है?

रामाष्टक भगवान श्रीराम की स्तुति में रचित संस्कृत स्तोत्र है। इसमें भगवान श्रीराम के सुंदर, करुणामय, रक्षक और परम ब्रह्म स्वरूप की स्तुति की गई है।

2. रामाष्टक की शुरुआत किस श्लोक से होती है?

इस संस्करण का रामाष्टक “भजे विशेषसुन्दरं समस्तपापखण्डनम्” से प्रारंभ होता है।

3. रामाष्टक में कितने श्लोक हैं?

रामाष्टक में मुख्य रूप से आठ श्लोक हैं। इसके बाद एक फलश्रुति दी गई है, इसलिए पाठ में कुल नौ पद दिखाई देते हैं।

4. रामाष्टक के रचयिता कौन हैं?

“भजे विशेषसुन्दरं…” वाले इस पाठ को परंपरा में श्रीव्यासविरचित रामाष्टक कहा जाता है।

5. रामाष्टक का पाठ कब करना चाहिए?

रामाष्टक का पाठ प्रातःकाल या संध्या के समय किया जा सकता है। श्रीराम नवमी, रामायण पाठ और भगवान श्रीराम की पूजा के अवसर पर भी इसका पाठ किया जाता है।

6. क्या रामाष्टक का पाठ रोज कर सकते हैं?

हाँ, श्रद्धालु अपनी सुविधा के अनुसार रामाष्टक का नियमित पाठ कर सकते हैं।

7. रामाष्टक पढ़ने से क्या लाभ होता है?

धार्मिक मान्यता के अनुसार रामाष्टक के पाठ से मन को शांति, सकारात्मकता और आध्यात्मिक प्रेरणा मिलती है। फलश्रुति में विद्या, श्री, सुख, कीर्ति और मोक्ष का उल्लेख मिलता है।

8. क्या रामाष्टक का पाठ बिना पूजा के किया जा सकता है?

हाँ। यदि पूजा की पूरी व्यवस्था संभव न हो तो स्वच्छ स्थान पर बैठकर श्रद्धा और एकाग्रता से रामाष्टक का पाठ किया जा सकता है।

9. रामाष्टक के बाद कौन सा मंत्र बोलना चाहिए?

रामाष्टक के बाद “श्री राम जय राम जय जय राम” या “ॐ श्री रामाय नमः” का जाप किया जा सकता है।

10. क्या रामाष्टक और राम रक्षा स्तोत्र एक ही हैं?

नहीं। रामाष्टक और राम रक्षा स्तोत्र अलग-अलग स्तोत्र हैं। रामाष्टक मुख्यतः भगवान श्रीराम की स्तुति के आठ श्लोकों वाला पाठ है, जबकि राम रक्षा स्तोत्र एक अलग विस्तृत स्तोत्र है।